Tuesday, 15 December 2015

मिथिलामे नवजागरणक किछु सन्दर्भ


 
डॉ. तारानन्द वियोगी
हमरा लोकनि जनैत छी जे उनैसम शताब्दी कें, भारतक इतिहास मे नवजागरणक शताब्दी कहल जाइत छैक । किछु इतिहासकार अवश्य एहि मे संकोच करैत देखल जाइत छथि आ ओ लोकनि एकरा समाजसुधार, राष्ट्रीय चेतनाक उभार आदिआदि नाम दैत छथि । किछु गोटें कें नवजागरणकहने पक्षपाती हेबाक खतरा बुझाइत छनि जखन कि अकादमिक अध्ययन कें निष्पक्ष आ तटस्थ हेबाक चाही । तकर अछैत नवजागरणशब्द आब पूर्ण प्रचलन मे आबि गेल छैक । हम जेना कि बूझि पबैत छी, नवजागरण कहल गेल अछिएक युग सँ दोसर युग, जे कि आइ अछि आ जैह कि विधेय थिक, मे संक्रमणक अर्थ मे । जें कि व्यापक समाजमानस कें आलोडि़तपरिवर्तित करबाक ई परिस्थिति बनौलक, तें नवजागरण । एकर तात्पर्य आस्थाक दिशापरिवर्त्तन सेहो बुझबाक चाही । जे कोनो हमर आस्थाविश्वास चलि आबि रहल छल पूर्व सँ, तकरा एक भिन्न दिशा मे नियोजित करब, जे कि बादक युगक हिसाबें सकारात्मक साबित भेल । जँ हम कही जे जागरणक अर्थ, सामाजिक सन्दर्भ मे, सामूहिक चेतनाक स्फुटीकरण थिक तँ संभवत: किनको एतराज नहि हएत । मुदा, एतराज तँ हमरा अपने अछि ओहि साहित्यकार लोकनिक मान्यता पर जे मानैत छथि जे क्यो एक विशिष्ट पुरुष, कवि वा समाजसुधारक चेतनाक जन्मदाता होइत छथि, ओही महापुरुष सँ चेतना प्राप्त कसमाज आगू बढ़ैत अछि । होइत अछि वस्तुत: एकर उनटा । चेतना जन्मैत अछि समाज मे आ महापुरुष लोकनि ओकर (चेतनाक) अभिव्यक्तिमात्र होइत छथि । ओ चेतनाक शृंगार थिकाहप्राय: ताहि अर्थ मे । अस्तु ।
तखन, हमरा लोकनि ईहो देखैत छी जे एही शताब्दी मे 1857क विद्रोह भेल रहैक । एक दिस जँ ई विश्वक एहन पहिल सिपाहीविद्रोह रहए जाहि मे सेनाक सवा लाख सिपाही अपने सरकारक विरुद्ध ठाढ़ भगेल तँ दोसर दिस ईहो जे बदलाक कार्रवाइ मे अंग्रेज सरकार बाइस लाख आम जनताक हत्या केलक । हत्याक तरीका एते निर्मम आ बर्बर, जकर जोड़ा इतिहास मे कम्मे हएत । आइ एहि संग्राम कें विदेशी दासताक प्रति आमजनक महायुद्धकहल जाइत छैक आ पबैत छी जे एहि महायुद्ध पर जते सामग्री एखन धरि लिखल गेल अछि आ आइयो लिखल जा रहल अछि, से कदाचित द्वितीय विश्वयुद्धक बाद दोसर नम्बर पर एकरे राखल जाएतएकर अछैत जे एहि प्रसंगक 90 प्रतिशत दस्तावेज अंग्रेज सरकार नष्ट कदेने छल । सौंसे भारत एहि सँ दलमलित छल तँ मिथिला पर एकर प्रभाव नहि पड़ल हेतै, से कोना कहल जाएत ? हमरा इलाका मे तँ किम्वदन्ती प्रसिद्ध अछि जे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ कें एही संग्राम मे अंग्रेज सरकार भीतर केने रहनि आ ओ अपन योगबल सँ जेल सँ बहरा गेल रहथि वा हुनकर शिष्य जॉन क्रिश्चियन जमानतदार बनिकहुनका छोड़बौने छलथिन । एम्हर समस्तीपुर इलाकाक बारे मे पढ़ल अछि जे युद्धक बाद, ओम्हर गामगाम मे प्रचार भगेलै जे कम्पनीक राज खतम भगेल, आब देश आजाद अछि । एहि प्रचार कें गलत साबित करबाक लेल तिरहुतक मजिस्ट्रेट डम्पियर, स्वयं अपना नेतृत्व मे सेना लकूच केने रहए आ जानि नहि कतेक हजार लोकक खून कआपस घुरल रहय । सेहो खून कोना ? बीच गाम पर गाछ मे लटका फाँसी दय मूड़ी कटबा कय अंगभंग क’, कुट्टी काटि कुकूर कें खुआ कआदिआदि । अनुमान कएल जाय जे आमलोकक मानस पर केहन गँहीर छाप पड़ल हेतै एहि दृश्य सभक!
मुदा हमरा लोकनि देखैत छी जे

Friday, 5 June 2015

विद्यापतिक बिस्फी ताम्रपत्रः ऐतिहासिकता ओ वास्तविकता

डा. शंकरदेवझा
विद्यापति मैथिल छलाह एहि विवादक निराकरणक आब दीर्घ अवधि व्यतीत भऽ चुकल अछि । विद्यापतिक मैथिल परिचिति प्रमाणित करबाक उद्देश्यसँ जुटाओल गेल समस्त प्रमाणक प्रामाणिकतापर विद्वत समुदाय द्वारा अपन मोहर लगाओल जा चुकल अछि । तथापि एकटा प्रमाण एहनो अछि जकर ऐतिहासिकता ओ वास्तविकता एखनहुँ धरि सन्दिग्ध बनले अछि । ओ प्रमाण थिक विद्यापतिक आश्रयदाता ओइनिवारवंशीय नरेश शिवसिंह द्वारा देल गेल बिस्फी दानक ताम्रपत्र । एहि ताम्रपत्रकेँ ल'' एखनहुँ धरि भ्रम बनले अछि जे ओ ताम्रपत्र असली थिक वा जाली ?
महाकवि विद्यापति भारतीय साहित्य ओ सांस्कृतिक ओ जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र थिका जनिका पाबि कऽ के नहि गौरवान्वित होअय चाहत ! विद्यापतिक कोमलकान्त पदावली समस्त पूर्वाञ्चलमे से धूम मचौलक जे पाँच सय वर्ष धरि ई प्रक्षेत्र विद्यापतिमय बनल रहल । बंगालीलोकनि विद्यापतिसँ ततबा अभिभूत छलाह जे ओ लोकनि मानि लेने रहथि जे विद्यापति हुनकेटा छथिन । उनैसम शताब्दीक मध्यमे नवजागरणसँ उद्भूत बंगाल एहि महापुरुषकेँ अन्तिम रूपसँ बंगाली प्रमाणित करबाक हेतु फाँड़ भीड़िकऽ ठाढ़ भऽ गेल । विद्यापतिक बंगाली परिचिति साबित करबाक हेतु बंगालमे एकटा बिस्फी नाम ग्राम सेहो ताकि लेल गेल । एतबे किएक बंगालमे एकटा शिवसिंह नामक राजा ओ लखिमा नामक रानीकेँ सेहो गढ़ि कऽ ठाढ़ कऽ देल गेल ।
उनैसम शताब्दीक ओहि मध्यकालमे बंगालमे भाषा जागरण हिलोड़ मारि रहल छल तँ दोसर दिस मिथिला अपने दिन-दुनियाँमे ओझरायल छल । मैथिल विद्वानलोकनि वैह दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष सन विद्याक गम्भीरतामे डूबल छलाह । समाजक जे लक्ष्मीपात्रलोकनि छलाह तनिका मामिला-मोकदमासँ फुरसतिये नहि । अपन मिथिला-भाषाक अस्मिताक रक्षा ओ एकर उत्थानक प्रति मैथिल समाजमे प्रायः चेतनाक भाव नहिये जकाँ छल । मिथिला विभूति विद्यापतिकेँ छद्म प्रमाणक आधारपर बंगालीलोकनि हथिअयबापर वृत्त छलाह आ मैथिल लेखेँ धनि सनक स्थिति छल । तथापि भाषा-चेतनाक दृष्टिएँ ओहि तिमिताछन्नहु कालमे मिथिलामे कमसँ कम एकटा व्यक्तित्व अवश्ये एहन छलाह जनिका हृदयमे अपन भाषा ओ संस्कृतिक लेल अजस्र चिन्ता छलनि । ओ व्यक्तित्व छलाह दरभंगाक पिण्डारूच ग्राम निवासी चन्दा झा ( १८३०-१९०७) । विद्वान ओ पंडितसँ भरल मिथिलामे प्रायः एकमात्र चन्देझा एहन व्यक्तित्व छलाह जे मैथिली भाषा-साहित्यक गौरवशाली इतिहासक अन्वेषणक संग-संग विद्यापतिक मैथिल परिचितिक प्रमाण सब जुटयबामे

Wednesday, 3 June 2015

मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍तपात्रक चि‍त्रण

शिव कुमार झा 'टिल्लू'
पन्‍यास कोनो गद्य साहि‍त्‍य रूपी व्‍यष्‍टि‍क आत्‍मा मानल जाइत अछि‍ । मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगभग सए वर्ख पूर्व धरि‍ उपन्‍यास वि‍धाक रचना लगभग शून्‍य छल । ऐ ‍‍ कारण ओइ‍‍ अवधि‍ धरि‍ मैथि‍लीकेँ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क भाषा नै‍‍ मानल जाइत छल । जनसीदन जी ऐ‍‍ भाषा साहि‍त्‍यक पहि‍ल मान्‍य उपन्‍यासकार छथि ‍। हि‍नक पाँच गोट उपन्‍यासक पश्‍चात् एखन धरि‍ देसि‍ल वयनामे साहि‍त्‍यक समग्र वि‍धाक चि‍त्रण करैत बहुत रास उपन्‍यास पाठक धरि‍ पहुँचल अछि‍ । परंच ऐ‍ साहि‍त्‍यक संग सभसँ पैघ बि‍डम्‍वना रहल जे पछाति‍क समाज जकरा सामाजि‍क शब्‍दमे दलि‍त कहल जाइत अछि‍, ओकर महि‍मामंडनक गप्‍प तँ दूर प्राय: ऐ‍‍ साहि‍त्‍यमे अकस्‍मात् अवांछि‍त अभ्‍यागत्तक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतौ-कतौ चर्चित अछि ‍। दलि‍त वर्ग तँ सामाजि‍क, सांस्‍कृति‍क आ शैक्षणि‍क रूपेँ सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे पि‍छड़ल छथि‍ मुदा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीमे हि‍नक स्‍थानक वि‍वेचन हि‍नका सबहक जाति‍ जकाँ अछोप अछि ‍। एकर प्रमुख कारण मि‍थि‍लामे धर्मसुधार आन्‍दोलन, वि‍धवा वि‍वाहक सकारात्‍मक दृष्‍टकोण प्राय: मृतप्राय रहि‍ गेल । दार्शनि‍क उदयानाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक ऐ‍‍ भूमि‍पर सनातन संस्‍कृति‍क पुनरूद्वार तँ भेल मुदा ऐ‍ पुनरूद्वारपर आडंवर धर्मी व्‍यवस्‍थाक अमरतत्ती मूल संस्‍कृति‍क बि‍म्‍बकेँ सुखा देलक । समाजक साम्‍यवादी सोच भगजोगि‍नी बनि‍ सवर्ण-दलि‍तक मध्‍य भि‍न्न सामाजि‍क दशाक मध्‍य मात्र टि‍मटि‍माइत रहल । ऐ‍‍ कारण सम्‍यक दृष्‍टि‍कोण रहि‍तहुँ मैथि‍ली भाषाक स्‍थापि‍त रचनाकारक लेखनी व्‍यथि‍त आ शोषि‍त दलि‍तक मर्मस्‍पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशि‍त नै‍‍ कऽ सकल । कथा-कवि‍ता आ गल्‍पमे तँ दलि‍तक चि‍त्रण भेटैत अि‍छ मुदा उपन्‍यासमे अत्‍यल्‍प । अपन व्‍यथाक वि‍वेचन दलि‍त वर्गक साहि‍त्‍यकार सेहो नै‍‍ कऽ सकलाह, कि‍एक तँ हि‍नक संख्‍या एखन धरि‍ नगन्‍य अछि‍ । संभवत: दलि‍त रचनाकारक उपन्‍यास अपन वयनामे मैथि‍लीकेँ एखन धरि‍ नै‍‍ भेटलनि ‍। सभसँ जनप्रि‍य उपन्‍यासकार हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यमे दलि‍त वर्ग अनुपस्‍थि‍त जकाँ छथि । यात्रीक बलचनमा ओना ऐ‍‍ वर्ग दि‍स संकेत करैत अछि‍ ओहि‍ना जेना ललि‍तक पृथ्‍वीपूत्र, धूमकेतुक मोड़पर आ रमानंद रेणुक दूध-फूल । यात्रीक पारो आ नवतुरि‍या वि‍षएक चयनक कारण दलि‍त वर्ग दि‍स धि‍यान नै‍‍ दऽ सकल । धीरेश्‍वर झा धीरेन्‍द्रकादो ओ कोयलाछोट लोकक वि‍रनीक कथा कहैत अछि‍ तँ हुनकर ठुमकि‍ बहू कमलामे दलि‍त वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकि‍सुनक माध्‍यमसँ कहल गेल अछि‍ । मणि‍पद्ममक उपन्‍यासक राजा सहलेस दलि‍त दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि‍ तँ लोरि‍क वि‍जयउपन्‍यासक नायक तँ यादव छथि‍ मुदा हुनका मि‍त्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलि‍त वर्गक छथि‍- लोरि‍कक कि‍छु वि‍रोधी सेहो दलि‍त वर्गक शासक छथि‍- मोचलि‍- गजभीमलि‍, हरवा आदि‍ बंठाक संहार परि‍स्‍थि‍ति‍वश करैत छथि‍ आ तइसँ लोरि‍क वि‍जयमे दलि‍त कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि‍ । नैका बनि‍जारामे सेहो नैकाक पत्नी फुलेश्‍वरीकेँ कि‍नवाक वर्णन अछि‍ । हुनकर फुटपाथ भि‍खमंगा सबहक कथा कहैत अछि‍ तँ लि‍लीरेक पटाक्षेप भूमि‍हीनक नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलनक कथा कहैत अछि‍ । आधुनि‍क कालक प्रसि‍द्ध उपन्‍यासकार वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍तजी ऐ‍‍ वि‍षएपर अपन लेखनीकेँ कोशीक भदैया धार जकाँ झमाड़ि‍ कऽ प्रयोग कएलनि ‍। ओना तँ वि‍दि‍त जी एखन धरि‍ आठ-नौ गोट उपन्‍यासक रचना कएलनि‍ अछि‍, परंच हि‍नक तीन गोट उपन्‍यासमे दलि‍तक दशाक चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अपूर्व नि‍धि‍ मानल जा सकैछ । हि‍नक वि‍प्‍लवी बेसराक कथामे आदि‍वासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि‍।कौसि‍लि‍याउपन्‍यासमे तँ फुलि‍या  चमैनक पात्रताक चि‍त्रण अनुपमेय अछि‍ । वि‍दि‍त जीक तेसर उपन्‍यास मानव कल्‍पमे मि‍थि‍ला, अंग आ झारखंडक ऑचरमे बसल लगभग सम्‍पूर्ण दलि‍त समाजक वि‍वेचन कएल गेल । ओना तँ श्रीमती शेफालि‍का वर्मा जी मानव धर्मी रचनाकार छथि‍ । हि‍नक समग्र साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे जाति‍ शब्‍द भूमंडलीकृत अछि ‍।नाग फांसउपन्‍यासमे जाति‍वादी व्‍यवस्‍थासँ शेफालि‍का जी बचबाक प्रयास कएलनि‍, परंच ऐ‍‍ उपन्‍यासक एकटा पात्र आकाशक पत्नी तरंगक प्रकृति‍सँ बुझना जाइत अछि‍, जे ओ दलि‍त छथि‍ । कहबाक लेल तँ सभ साहि‍त्‍यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहैत छथि‍ मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथि‍लीक सर्वकालीन साहि‍त्‍यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही । हि‍नक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जि‍नगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन)मे दलि‍तक चि‍त्रण अनायास भेटि‍ जाइत अछि ‍। लि‍खबाक शैली ओ बि‍म्‍बक चयन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण- दलि‍तक मध्‍य कोनो खाधि‍ नै‍‍ । सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नै‍‍ रहत, ऐ ‍सँ मि‍थि‍लाक समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍मे भवि‍ष्‍यमे सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न:.. सि‍द्धान्‍तक स्‍थापना अवश्‍य हएत । हि‍नक अवि‍रल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति‍ मौलाइल गाछक फूलमे दलि‍त समाजक महादलि‍त मुसहर जाति‍क रोगही, बेंगवा, कबुतरीक मनोदशा आ नि‍त्‍यकर्मसँ समाजमे शांति‍क ज्‍योति‍ जगएबाक कल्‍पना अनमोल अछि ‍। दड़ि‍भंगाक प्‍लेटफार्मपरसँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मारीचि‍का एकठॉ भक्क दऽ उगि‍ जाइत अछि‍ । भजुआ, झोलि‍या आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जाति‍क छथि‍ जि‍नकर सहायता सम्‍यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍त जी करैत छथि‍ । ऐ‍‍ कृति‍क सभसँ अजगुत पात्र छथि‍ रमाकान्‍त जी । हि‍नक छोट पुत्र कालक डाँगसँ अधमरू वनि‍ता सुजाता जे धोवि‍न छथि‍ ति‍नकासँ वि‍वाह कऽ लैत छथि‍ । वि‍वाहे टा नै‍‍ वि‍वाहसँ शि‍क्षा ग्रहन करबाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि‍ जइसँ ओ डा. सुजाता बनि‍ गेली । गाममे रहनि‍हार आ अपन मातृभूमि‍क प्रति‍ असीम श्रद्धा रखनि‍हार रमाकान्‍त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक

Monday, 23 March 2015

रास, रासक आ लीला समानार्थी नहि


कमल मोहन 'चुन्नू'
-कमल मोहन 'चुन्नू'
                             
चैतन्यदेव बंगालक एकटा समर्थ सांस्कृतिक नायक रूप मे प्रसिद्ध भेल छथि । हिनकर जीवनी पढ़ला सँ आ हिनकहि परम्पराक परवर्ती आचार्यलोकनिक साहित्य देखलासँ एतबा अवश्य स्पष्ट होइछ जे हिनक जीवन मे नाट्य-विधाक बेस महत्व छल । नाटक-लीलादिक कतेको आयोजन कएने रहथि । कानाइ नाटशाला तहिनकहि सम्पर्क पाबि प्रसिद्ध भेल छल । कहल जाइछ जे चैतन्यदेव जखन कृष्णलीलाक आयोजन करथि तकएक टा सहयोगी भक्त मे तद्पात्रीय आवेश आबि जाइत छल । कृष्णक नृत्य-अभिनय तततेक विराट ओ विस्तीर्य छल जे स्वयं नटराज महादेव हिनक महारास मे शामिल भहिनक नृत्य-अभिनयादिक आनंद प्राप्तिक हेतु स्त्रीरूप पर्यन्त धारण करबा लेल विवश भगेलाह । हिनक संगीत-नृत्य-अभिनयादिक दक्षताक पुरस्कारकस्वरूप वेदव्यास हिनका नटवरबपुः’(1) सेहो कहलनि । मुदा मिथिलामे एहन कोनहु सांस्कृतिक नायक नहि भेलाह जनिकर नाट्य-चेतना आ कि ठाढ़ कएल गेल परम्परा पर गर्व कएल जा सकय
रामलीला, रासलीला आ कि गौरलीलाक उद्भव क्षेत्र किंवा प्रमुखतासँ मंचन-प्रदर्शन होमयबला क्षेत्र अछि-बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखंड, उत्तरांचल, उड़ीसा, आसाम, बंगाल, नेपाल आदि । एतहुक मुख्य भाषा अछि-मैथिली, भोजपुरी, मगही, हिन्दी, उड़िया, असमिया, बांगला, नेपाली आदि । मुदा एहि सभ भाषा-साहित्यक ई त्रसदी अछि जे लीला-मंचनकेँ नाटकक आ कि साहित्यक अंगे नहि मानल गेल । मैथिली, बांगला, हिन्दी, असमिया प्रभृतिक साहित्यक इतिहासमे एकहु अध्याय, एकहु पाँति रामलीला-रासलीला किंवा गौरलीलाक निमित्त नहि लिखल गेल अछि । दुर्गानाथ झा श्रीश’, डा. जयकांत मिश्र, डा. दिनेश कुमार झा (मैथिली साहित्यक इतिहास लेखक), डा. सुकुमार सेन (बांगला साहित्यक इतिहास लेखक) कि विरिंचि कुमार बरुआ (असमिया साहित्यक इतिहास लेखक) लोकनि लीलामंचक रूप-सौन्दर्यक इतिवृत्तिकेँ अछोपे बुझलनि
डा. प्रेमशंकर सिंह अपन नाट्य-विषयक पुस्तक मैथिली नाटक ओ रंगमंच’ (मैथिली अकादमी, पटना) मे लीला-नाटकनामसँ अवश्य चर्च कएलनि अछि । मुदा हिनक एतद्विषयक स्थापना, जाहि क्रममे डा. दशरथ ओझा आ डा. हजारीप्रसाद द्विवेदीक कथनक सेहो उपयोग कएलनि अछि, से भ्रमेक उत्पत्ति मे सहायक होइत अछि । उदाहरणस्वरूप देखल जाय-
(i) रास एवं लीला मे कोनहु भेद नहि । ---इएह रासक-रास आगाँ जा कप्रयुक्त भेल (2)
(ii) रास शब्द संस्कृत भाषाक नहि अछि, प्रत्युत देशी भाषाक थीक--- रासकेँ देशी होयबाक कल्पना एहू बातसँ होइछ जे रासो आर रासक नामसँ राजस्थानी मे एकर प्रयोग भेटैछ, आर ओ रास जकर विशेष सम्बन्ध गोपी लोकनिसँ अछि । (डा. दशरथ ओझाक कथन) (3)
(iii) भागवत महापुराणमे कृष्णलीलाक जाहि परम्पराक अभिव्यक्ति भेल, ओहिसँ भिन्न एक आर परम्परा छल जकर प्रकाश जयदेवक गीत-गोविन्दमे भेल । भागवत-परम्पराक रासलीला शरद पूर्णिमाकेँ भेल छल, गीत-गोविन्द-परम्पराक रास वसंत कालमे भेल । (डा. हजारीप्रसाद द्विवेदीक कथन) (4)
 उपर्युक्त पहिल कथनक विवेचना हेतु प्रथमतः एहि पद रासलीलाक संक्षिप्त व्याख्या अपेक्षित । एहिसँ एतबा अवश्य स्पष्ट भजएबाक चाही जे

Thursday, 12 February 2015

मैथिली कविताक जापानी विधा

-चन्दनकुमार झा
वैज्ञानिक उपलब्धि, पश्चिमी विचारधाराक प्रवेश, प्राचीन परम्पराक प्रति विरक्ति, अन्यान्य भाषा-साहित्यक प्रभावसँ मैथिली साहित्यमे खासक' कविताक्षेत्रमे आधुनिकताक सूत्रपात भेल बंगलाक प्रभावसँ एकर कल्पनाशीलताक विकास भेलैक अंगरेजी आदि भाषाक प्रभावसँ मैथिली कवितामे प्रयोगवादी परम्पराक विकास भेल अंगरेजी काव्य साहित्यक बैलेड, सौनेट प्रभृति काव्य रीतिक प्रयोग भेल तहिना मध्ययुगमे मिथिलाक्षेत्रमे जे उर्दू-फारसीक प्रचलन भेल छल तकर प्रभावसँ मैथिलीमे गजलक आविर्भाव भेल हिन्दीक समानान्तर मैथिलीयोमे छायावाद, प्रगतिवाद आदि काव्यधारा आयल बीसम शताब्दीक तेसर दशकमे मार्क्सक भौतिकवादी प्रवृति प्रगितवाद प्रयोगवादकेँ जन्मदेलक तँ फ्रायडक मनोविश्लेषण सामाजिक कुण्ठा अव्यवस्थाकेँ मैथिली काव्यमे अभिव्यक्ति देलक आदर्शवाद, अभिव्यंजनावाद, यथार्थवाद, साम्यवाद,समाजवाद,तदर्थवाद, अग्णिवाद, आदि अनेक विचारधारा विभिन्न कालखण्डमे आधुनिक मैथिली कविताक कथ्य तथा शिल्पकेँ प्रभावित करैत रहल अछि साठिक दशकमे नवगीतक परिकल्पना कएल गेल जे एकतरहेँ पारम्परिक शिल्प नवीन कथ्यक बीच संतुलन स्थापित करबाक एकटा अभिनव प्रयास छल, शाइत कविताकेँ अलोकप्रियतासँ बचेबाक एकटा प्रयास सेहो
आधुनिक युगमे मनुष्यक जीवन यंत्रवत भए गेल व्यस्ततम जीवनक कारणेँ ओकरा लग प्रकृति दिस घूरि तकबाक समय नहि रहलैक आधुनिकता प्रदत्त सुख-साधनक अछैतो ओकरा भीतर सदति अशांति पैसल रहैत छैक मुदा,एहि भौतिकतावादी संस्कृतिसँ जखन अकछा जाइछ तखन  भावनाशील भऽ जाइत अछि ओकर कविहृदय जागि उठैत छैक प्रायः एहने युगधर्मक कारणेँ विश्वभरिमे लघु आकारक कविताक आकर्षण बढ़ल अछि भारतीय साहित्य जगतमे सेहो क्षणिका लिखबाक प्रचलन भेल तथा जापानी लघु काव्य विधा यथा- हाइकू, तांका, आदिक लोकप्रियता बढ़ल ।

जापानमे लघुआकारक कविता लिखबाक परम्परा लगभग ओतबे पुरान अछि जतेक मैथिली साहित्यक इतिहास चोका, सेहोका, तांका अथवा वाका,एकर प्रचीनतम काव्यविधा थिक तांका एक प्रकारक लघुगीत होइत अछि जाहिमे लयात्मकताक गुण विद्यमान रहैत छैक आठम शताब्दीक अंतसँ