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| डॉ. तारानन्द वियोगी |
तखन, हमरा लोकनि ईहो देखैत छी जे एही शताब्दी मे 1857क विद्रोह भेल रहैक । एक दिस जँ ई विश्वक एहन पहिल सिपाही–विद्रोह रहए जाहि मे सेनाक सवा लाख सिपाही अपने सरकारक
विरुद्ध ठाढ़ भ’ गेल तँ
दोसर दिस ईहो जे बदलाक कार्रवाइ मे अंग्रेज सरकार बाइस लाख आम जनताक हत्या केलक ।
हत्याक तरीका एते निर्मम आ बर्बर, जकर जोड़ा इतिहास मे कम्मे हएत । आइ एहि संग्राम कें विदेशी
दासताक प्रति आमजनक ‘महायुद्ध’ कहल जाइत छैक आ पबैत छी जे एहि महायुद्ध पर जते सामग्री एखन
धरि लिखल गेल अछि आ आइयो लिखल जा रहल अछि, से कदाचित द्वितीय विश्वयुद्धक बाद दोसर नम्बर पर एकरे राखल
जाएत–एकर अछैत जे एहि प्रसंगक 90 प्रतिशत दस्तावेज अंग्रेज सरकार नष्ट क’ देने छल । सौंसे भारत एहि सँ दलमलित छल तँ मिथिला पर एकर
प्रभाव नहि पड़ल हेतै, से कोना कहल जाएत ? हमरा इलाका मे तँ किम्वदन्ती प्रसिद्ध अछि जे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ कें एही
संग्राम मे अंग्रेज सरकार भीतर केने रहनि आ ओ अपन योगबल सँ जेल सँ बहरा गेल रहथि
वा हुनकर शिष्य जॉन क्रिश्चियन जमानतदार बनिक’ हुनका छोड़बौने छलथिन । एम्हर समस्तीपुर इलाकाक बारे मे
पढ़ल अछि जे युद्धक बाद, ओम्हर गाम–गाम मे
प्रचार भ’
गेलै जे कम्पनीक राज खतम भ’ गेल, आब देश आजाद अछि । एहि प्रचार कें गलत साबित करबाक लेल तिरहुतक मजिस्ट्रेट
डम्पियर,
स्वयं अपना नेतृत्व मे सेना ल’ क’ कूच केने रहए आ जानि नहि कतेक हजार लोकक खून क’ क’ आपस घुरल रहय । सेहो खून कोना ? बीच गाम पर गाछ मे लटका फाँसी द’ क’य
मूड़ी कटबा कय अंग–भंग क’ क’, कुट्टी काटि कुकूर कें खुआ क’ आदि–आदि ।
अनुमान कएल जाय जे आमलोकक मानस पर केहन गँहीर छाप पड़ल हेतै एहि दृश्य सभक!
मुदा हमरा लोकनि देखैत छी जे



