Wednesday, 31 December 2014

की मिथिला, के मैथिल


डॉ.अशोक अविचल
-डॉ.अशोक अविचल

मिथिला आजुक कालखण्डमे कोनो राजनीतिक वा प्रशासनिक इकाइ नहि अछि । इहो स्वीकारबामे कोनो संकोच नहि जे आधुनिक विकासक मापदण्ड अर्थात पैघ–पैघ उद्योग, देश आ विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान, विद्युत उत्पादन इकाइ, प्रति व्यक्ति आमदनी, साक्षर आ शिक्षितक प्रति सौ पर संख्या आदिक दृष्टिएँ आइ एकर स्थिति संतोषजनक नहि छैक । सामाजिक क्षेत्रमे स्मृतियुगक पश्चात कोनो सुचिंतित, सुनियोजित क्रांति नहि भेलैक अछि । छुआछूतक अमानवीय आ विभेदक सीमा रेखा तऽ कहियो न्याय आ मीमांसाक तार्किक परिवेशमे मर्यादाक अतिक्रमण नहि कऽ सकल अछि मुदा जतय जन कल्याण निमित जनक सन ब्रह्यज्ञानी राजाकेँ हरवाह बनयमे संकोच नहि जतय माटिक उपजा सीता सन धीआ ततय जातीय भेद समन्वयित मैथिलतत्वमे बाधक ! इ- गप्प तऽ मानहि पड़त । इहो तथ्य जे सीताक भूमि पर एखन बिना खरीदने धीआ लेल बर जुटाएब दुभर भेल जा रहल अछि । सामाजिक तान आ बान्ह शिथिल भऽ रहल अछि । आधुनिकताक प्रवाहमे नव नौतार उधियेल जा रहल अछि । संस्कृति आ परम्परा विध पुरएवाक परिपाटी धरि बनि गेल अछि । परिछन, कोहबर, समदाओन, सम्मर, बटगवनी, चौमासा, बारहमासा, लगनी, डहकन, आदि गीतक प्रति पढुआ लिखुआ धीआ –पुताक रुझान न्यून भऽ रहल अछि । हँ इ-सभ जीबैत अछि ओहि लोक आ वर्गक हृदय आ कंठमे, ठोर आ लोल पर जे भाषा आ संस्कृतिक संरक्षक तऽ अछि मुदा आधुनिक शिक्षा आ आर्थिक विकास क्रममे पछुआएल मानल जाइत अछि ।
एहना सन परिस्थितिमे जखन मिथिला राज्यक गठनक मांग फेर जोर पकड़ने अछि ई प्रश्न वेश सार्थक बुझना जाइछ जे की मिथिला के मैथिल ?
मिथिला शब्दक व्याख्या महान वैयाकरण पाणिनी उणादि सुत्रक व्याख्या क्रमे
“मिथिलादयश्च अर्थात “मथ्यन्ते रिपव: यत्र सा मिथिला”१
(उणादि सुत्र ६) वा एना कही जे मथ्यन्ते रिपवोऽस्यां सा मिथिला नगरी । सीरध्वज जनक द्वारा सांकाश्य राजा सुधन्बाक शिवधनुष आ पुत्री देवाक प्रस्ताव ठुकरा ओकरा पर आक्रमण कऽ दर्पदलन एवं अनुज कुशध्वजक राज्यारोहन एकर पुष्टि करैत अछि ।
ओना वृहदविष्णुपुराणक मिथिला महात्म्यमे
जन्मना जनक: सोऽभूदवैदेहस्तु विदेहज:
मिथिलामथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता ।।
आ मत्स्यपुराणमे मिथिस्तु मथनाज्जातो मिथिल येन निर्मिता, उल्लेख भेल अछि । ई उक्ति प्रचलित आख्यान जे इक्ष्वाकुक पुत्र निमि आ हुनक  पुत्र मिथि जिनक जन्म वशिष्ठक शापसँ निमिक देहावसानक उपरान्त गौतम, याज्ञवलक्य, कण्व, अगस्त्य, वाल्मिकि आदि ऋषिगण द्वारा निमिक देहक मंथनसँ मिथिक जन्म भेल जिनका नाम पर मिथिला नाम पड़ल, केर आधार पर प्रचलित अछि । मिथिलाक परम्परागत तर्कशील मनीषा एहि स्थापनाकेँ मानि लेबामे संकोचक अनुभव करैत अछि । वृहदारण्यकोपनिषदमे उल्लेखित सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हेतु शास्त्रार्थ जकर आयोजन छठम जनक देवरात कएने, छलाह प्राय: मिथिलाक आ मंथन केर लाक्षणिक भाव आ निहितार्थ स्पष्ट करैत अछि । एतय शत्रु मंथन नहि अपितु विचार मंथन होइत छल । तर्क द्वारा उपस्थापित विचारक मंथनक उपरान्त तथ्यान्वेषणक परिपाटी जतय सैह मिथिला ।
हँ इहो सत्य जे मिथिला सहिष्णुता, संवेदना, सहअस्तित्व, समता आदि मानवीय मूल्यक प्रतिनिधित्व तऽ करैत रहल परंञ्च कायरताक पृष्ठपोषक कथमपि नहि रहल । एतुका राजा सभ सेहो ब्रह्यज्ञानी हेवाक संग स्वाभिमान आ मिथिलाक संप्रभुताक लेल शस्त्र धारण करवामे संकोच नहि केलनि । तेँ पूर्ण मनुष्यक परिकल्पना थिक मिथिला । देहसँ तकतगर, मन पर नियंत्रण, आत्माक आ परमात्माक संबंधमे जिज्ञासा, मानवीय मूल्यक स्थापन, इएह रहल मिथिलाक आदर्श  ।
अग्रत: सकलं शास्त्रं पृष्ठत: ससर: धनु:
तेँ शब्द, विचार, तर्कक मंथन आ आवश्यकता पड़ला पर स्वाभिमान आ राज्यक सम्प्रभुताक रक्षाक हेतु शत्रुक सेहो मंथन तेँ मिथिला । एतय इहो उल्लेख करब आवश्यक जे उत्तर वैदिक कालक ग्रन्थ सभ जेना ब्राह्यण-आरण्यक आ उपनिषदादिमे मिथिलाक बेर बेर चर्च भेल अछि आ से वैदुष्य, ब्रह्यज्ञान, सुशासन, सशक्त देशक रुपमे । रामायणकालमे सेहो जनक पर आक्रमणक साहस केओ नहि कऽ सकैत छल तऽ महाभारत कालमे कौरवक पक्षमे युद्ध केनिहार मिथिलाक राजा क्षेमधूतिकेँ महारथी कहल गेल अछि । एतय ई तथ्य मंथन योग्य जे मिथिलाक विद्वान राजा कौरवक पक्षमे किएक छलाह । मुदा तर्क कहैत अछि जे पाण्डवक पक्षमे जाइयो नहि सकैत छलाह । कारण जे मिथिला अदौसँ सनातनवादी परम्पराक संरक्षक रुपें जानल जाइत रहल अछि । वैदिक परम्परा आ व्यवहारक पृष्ठपोषक रुपें एकर ख्याति छैक ।
एहना सन स्थितिमे परम्परागत इन्द्रपूजाक स्थान पर गोवर्धन पूजा प्रारम्भ केनिहार, ब्राह्यणक प्रथम पूजाक स्थान पर अपन पूजा करौनिहार, भागवतमे वर्णित कृष्णक अपनहि कथन परम्पराभंजक जाहिठाम, ततय मिथिला कोना रहि सकैत छल, तेँ भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शल्य, विदुरसँ सम्पोषित कौरवक पक्षमे युद्धक औचित्य सिद्ध होइत अछि । कोनो युद्धमे जय आ पराजय, पक्षक दोषी आ  निर्दोष होयवाक प्रमाण नहि भऽ सकैछ ।
हँ तऽ प्रश्न अछि मिथिला, जतय ज्ञान प्राप्ति हेतु विचारक  मंथन हो, मनकेँ नियंत्रित करक हेतु मनक मंथन हो तेँ मिथिलाक राजा विदेह, श्रृजनशील तेँ जनक, समतामूलक तेँ हर चलयवा लऽ तत्पर, आत्मज्ञानी तेँ ब्रह्यज्ञानी । सर्वविदित अछि जे व्यासपुत्र शुकदेव राजर्षि जनकक द्वारपालसँ अध्यात्मिक चर्च कऽ संतुष्टिक अनुभव करैत छलाह तऽ दशरथक पुत्रेष्टि यज्ञ हेतु कोशी तट पर स्थित विभांडक आश्रमसँ श्रृंगकेँ सर्वाधिक योग्य मानल गेल । तात्पर्य जे मिथिला ततय जतय विद्वता, जतय क्षमता । मिथिलाक तात्पर्य मंडन मिश्रक ग्राम जतय सुग्गा सभ सेहो शास्त्रार्थ करैत छलाह आ पनिभरनी पर्यन्त संस्कृतमे संभाषण । मिथिला ओतय जतय विदुषी भारतीक विद्वता । ऋषि लोकनिक  माध्यमे प्रकट भेल यजुर्वेदक समस्त मंत्र जाहि भू –भाग पर से, थिक मिथिला । आर्य आ पौर्वात्य संस्कृतिक आधार षड दर्शनमेसँ चारि टा’क प्रणयण जतय से दिव्य भूमि मिथिला । गौतमक न्याय, कणादक वैशेषिक, कपिलक सांख्य आ जैमिनीक मीमांसामे विद्यमान अछि मिथिला । मीमांसा दर्शनक तीनू शाखाक जन्मस्थान थिक मिथिला । सीताक जन्मस्थल, महावीर आ गौतमक जन्म आ कर्मस्थल थिक मिथिला । लोरिक आ सलहेशक हुंकार, दीनाभद्री चमत्कार, घर-घरमे  होइत अतिथि सत्कार  थिक मिथिला ।
भगवानक दर्शन नहि भेलापर हुनकहु देल उदयनाचार्यक एहि चुनौतीमे अछि मिथिला ।
    ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्तस ।
उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीनाः तवास्थितः ।।
ओना भौगोलिक स्थितिक दृष्टिसँ मिथिलाक वर्णन करैत वृहदविष्णुपुराण स्पष्ट करैत अछि:-
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकी मधिगम्यवै
योजनानि चतुर्विंशद व्याम: परिकीर्तितः ।
गंगा प्रवाहमारभ्य यावैद्ध मवतंवनम
विस्तार: षोडश प्रोक्तो देशस्य कुरुनन्दन ।।
तात्पर्य जे पूबमे कोशीसँ गण्डकधरि मिथिलाक लम्बाई २४ योजन, उत्तरमे हिमालयसँ गंगाधरि १६ योजन चौड़ाइ छल ।
एकरा आर स्पष्ट करैत कहल गेल अछि जे-  
गंगाहिमवतोर्मध्ये नदी पंच देशान्तरे
तैरभुक्तिरति ख्यातो देश: परम पावन:
मिथिला नाम नगरी मान्यते लोकविश्रुत:
पंचभि कारणै: पुण्याविख्याता जगतीत्रये ।
कवीश्वर चन्दा झा एकरा स्पष्ट करैत लिखलनि अछि जे -
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिश पूव- कौशिकी धारा
पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा
कमला, त्रियुगा, अमृता, घेसुरा, बागमती कृत सारा
मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा ।
ब्राह्मण आ जैन ग्रन्थमे मिथिलाक जाहि भौगोलिक स्वरूपक वर्णन भेटैत अछि तदनुसार मिथिला (विदेह) कोशल राज्य आ गण्डकी (सदानीरा) केर पूरबमे स्थित मानल गेल अछि । बौद्ध ग्रन्थमे तऽ वैशालीक राजकुमारीक पुत्र अजातशत्रुकेँ विदेहपुत्र कहल गेल अछि ।(हिस्ट्री ऑफ विदेह)
एतेक तऽ स्पष्ट अछि जे प्राचीन कालमे आर्यावर्तमे मिथिला अलग, सम्प्रभु आ विद्वतासँ परिपूर्ण राज्य छल । चीनी यात्री ह्वेनसांग केर “फाइव इण्डियाज”मे सेहो मिथिला सम्मिलित अछि ।
वृहदविष्णुपुराणमे मिथिलाक बारह टा नामक उल्लेख भेटैत अछि जेना -
१) विदेह २) मिथिला  ३) तीर भुक्ति  ४) नेमिकानन  ५) ज्ञानपीठ ६) स्वर्णलांग ७) शाम्भवी  ८) जानकी–जन्मभूमि ९) विकल्मषा १०) रामानन्द कटि ११) विश्वभामिनी १२) नित्यमंगला   ।
मुदा सभ प्राचीन ग्रन्थमे विदेह, मिथिला आ तीरभुक्ति  नामक विशेष उल्लेख भेल अछि । ब्रह्यचिन्तनमे लीन रहक कारणे मिथिलाक जनकवंशक सभ राजाकेँ विदेह कहल गेल । देवी भागवतमे उल्लेख भेल अछि जे-
वंशोस्मिन चेपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा ।
विख्याता ज्ञानिन: सर्वे विदेहा परिकीर्तिताः ।।
ओना मिथिलाक एकटा आर शाब्दिक अर्थ होइत अछि । मिथिलामे दू टा शब्द अछि मिथि आ इला । मिथिक अर्थ मंथन आ इला'क तात्पर्य माटि, भूमि, पृथ्वीसँ अछि । स्पष्ट अछि जे मंथनसँ जाहि भूमिसँ विशेष उपज हो से भेल मिथिला ।
आजुक संताल परगनामे सेहो मैथिलक प्रवेश संताल लोकनिसँ पूवहि भेल । आइ तऽ मिथिलासँ तात्पर्य,  अछि बिहार आ झारखण्डक २२ गोट जिला जाहिमे कोशी, दरभंगा, तिरहुत, भागलपुर आ संताल परगनाक जिला अछि । इहो अधूरा अछि । कएिक तऽ नेपालक तराइक दू तिहाइ-भाग सेहो मिथिले थिक । ओना छत्तीसगढक रायपुर, कोरबा, राजनंदगा्रंव, चन्दनकियारी लग साठिघडिह्रया मैथिलक गाम सब जमशेदपुर, राँची, बोकारो, गोवा आदि ढेरो ठाम जतय मैथिल गेला दू सौ सँ चारि सौ वर्ष पहिनेसँ ओतय बसल छथि, से बसौने छथि बस ठाम एकटा विशिष्ट मिथिला । पुराणक अनुसार गोवाक बसिनहार केयो परशुराम नामक तिरहुतिया ब्राह्यण छलाह ।
आब प्रश्न अछि जे मैथिल के ? सामान्य गप अछि जे प्रश्न असंगत मुदा व्यवहारिक  तारतम्यक दृष्टिकोणे प्रासंगिक । जँ मन कुतर्क आ वितण्डाक अनुश्रवण नहि करय तऽ फरिछठक कोनो आवश्यकता नहि । जखन मिथिलाक अध्यात्मिक आ भौगोलिक सीमा रेखा स्पष्ट तऽ ओहि रेखाक मध्यक सभ निवासी मैथिल । मिथिलाक ओ सभ निवासी जे जीविकोपार्जन आ विद्वताक प्रसार लेल भऽ गेला प्रवासी ओहो छथि मैथिल । एकटा समय छल जखन सम्पूर्ण आर्यावर्तमे मैथिल विद्वान, पंडितक धाक छल । सभ राजा, जमीन्दार आदि पूजाक लेल आ शास्त्रार्थक लेल संगहि शिक्षकक रुपमे अपना ओहिठाम मैथिल पंडितक चाह रखैत छलाह । ओहि समय गेल ओहि मैथिल सभकेर वंशज हजारक हजार संख्यामे बोकारो, चन्दनकियारी, मालदह, राजनंदगांव, रायपुर, कोरबा, मध्यप्रदेश, कानपुर, आदि क्षेत्रमे बसल छथि । वेसी गोटे मैथिली भाषा प्राय: विसरि गेल छथि मुदा मैथिल संस्कृतिसँ अभिन्न रुपें जुडल छथि । ओ सभ छथि मैथिल । मिथिलाक तऽ ओहुना दुर्भाग्य रहलैक अछि जे एखन धरि दू बेर बटवारा कऽ एकरा तीन ठाम कऽ देल गेलैक अछि । प्रथमत: सुगौली सन्धिमे एकर पैघ भाग नेपालमे चल गेलैक आ फेर झारखण्ड बनला पर गोट्टा, देवघर, दुमका, साहिबगंज आदि मिथिलाक क्षेत्र झारखण्डक अंग बनि गेल । ई प्रक्रिया चलिये रहल अछि । कहियो दरभंगा महराज संरक्षित मैथिल महासभा मात्र ब्राह्यण आ कर्ण कायस्थके् मैथिल घोषित करक अवैज्ञानिक, निराधार आ अव्यवहारिक चेष्टा कऽ ‘के मैथिल ?” प्रश्न केर संकुचित व्याख्या केने छल जे मिथिलाक विपुल जनसंख्याकेँ आक्रोशित केलक । कविवर यात्री (नागर्जुन) सेहो एकर प्रतिवाद करैत कहने छलाह जे हुनक परिभाषामे तऽ हमहु् मैथिल नहि । मुदा मैथिल महासभाक प्रभाव क्षेत्र अति न्यून । आइयो लोकके ई गप्प नहि बुझल छैक । एक क्षेत्रक भाषा एकहि होइत अछि भाषा वैज्ञानिक दृष्टिएँ ओकरा अलग करब संभव नहि । जहिना बंगालक सभ केओ बंगाली, उड़ीसासाक सभ गोटे उड़ीया तहिना आचार्य नाजीम रीजवीक शब्दमे मिथिलाक माटि पानि पर रहनिहार एकर सुगन्ध दिकदिगन्तमे फैलओनिहार, सभ गोटे मैथिल । चाहे डोम हो वा ब्राह्यण । मुसलमान हो वा इसाइ । एतुका चिड़ैचुनमुनी, मालजाल धरिक भाषा मैथिली भाषा ओ सभ मैथिल । अंतमे हम डॉ. अरुण कुमार झाक एहि उक्ति संग तत्काल विराम जे-
न अहं बिहारी, न च धम-धारी, ब्राह्यणं वैश्य शुद्र:
निवासिन: मिथिला भुवि भारते, मैथिल, मैथिलोहं
सन्दर्भ ग्रन्थ:-
१)            शोध पत्रिका (लोक संस्कृति विशेषांक ) – मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा
२)            मिथिला दिगदर्शन-इन्द्रनारायण झा
३)            मिथिला का गौरव चैनपुर – डा० श्रीकान्त झा
४)            माइग्रेसन एण्ड एचीवमेन्ट आ्फ मैथिल पण्डित्स – जे०सी० झा
५)            मिथिलाक इतिहास – उपेन्द्र ठाकुर
६)            मैथिली भाषा : सर्वेक्षण आ विश्लेषण – डा० अशोक अविचल
७)            दरभंगा डिस्टिक गजेटियर
८)            भविष्यपुराण
९)            सतपथ ब्राह्यण
१०)         वृहदविष्णुपुराण
११)         देवी भागवत
१२)         शब्द कल्पद्रुम (शब्दकोष)



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