Tuesday, 15 December 2015

मिथिलामे नवजागरणक किछु सन्दर्भ


 
डॉ. तारानन्द वियोगी
हमरा लोकनि जनैत छी जे उनैसम शताब्दी कें, भारतक इतिहास मे नवजागरणक शताब्दी कहल जाइत छैक । किछु इतिहासकार अवश्य एहि मे संकोच करैत देखल जाइत छथि आ ओ लोकनि एकरा समाजसुधार, राष्ट्रीय चेतनाक उभार आदिआदि नाम दैत छथि । किछु गोटें कें नवजागरणकहने पक्षपाती हेबाक खतरा बुझाइत छनि जखन कि अकादमिक अध्ययन कें निष्पक्ष आ तटस्थ हेबाक चाही । तकर अछैत नवजागरणशब्द आब पूर्ण प्रचलन मे आबि गेल छैक । हम जेना कि बूझि पबैत छी, नवजागरण कहल गेल अछिएक युग सँ दोसर युग, जे कि आइ अछि आ जैह कि विधेय थिक, मे संक्रमणक अर्थ मे । जें कि व्यापक समाजमानस कें आलोडि़तपरिवर्तित करबाक ई परिस्थिति बनौलक, तें नवजागरण । एकर तात्पर्य आस्थाक दिशापरिवर्त्तन सेहो बुझबाक चाही । जे कोनो हमर आस्थाविश्वास चलि आबि रहल छल पूर्व सँ, तकरा एक भिन्न दिशा मे नियोजित करब, जे कि बादक युगक हिसाबें सकारात्मक साबित भेल । जँ हम कही जे जागरणक अर्थ, सामाजिक सन्दर्भ मे, सामूहिक चेतनाक स्फुटीकरण थिक तँ संभवत: किनको एतराज नहि हएत । मुदा, एतराज तँ हमरा अपने अछि ओहि साहित्यकार लोकनिक मान्यता पर जे मानैत छथि जे क्यो एक विशिष्ट पुरुष, कवि वा समाजसुधारक चेतनाक जन्मदाता होइत छथि, ओही महापुरुष सँ चेतना प्राप्त कसमाज आगू बढ़ैत अछि । होइत अछि वस्तुत: एकर उनटा । चेतना जन्मैत अछि समाज मे आ महापुरुष लोकनि ओकर (चेतनाक) अभिव्यक्तिमात्र होइत छथि । ओ चेतनाक शृंगार थिकाहप्राय: ताहि अर्थ मे । अस्तु ।
तखन, हमरा लोकनि ईहो देखैत छी जे एही शताब्दी मे 1857क विद्रोह भेल रहैक । एक दिस जँ ई विश्वक एहन पहिल सिपाहीविद्रोह रहए जाहि मे सेनाक सवा लाख सिपाही अपने सरकारक विरुद्ध ठाढ़ भगेल तँ दोसर दिस ईहो जे बदलाक कार्रवाइ मे अंग्रेज सरकार बाइस लाख आम जनताक हत्या केलक । हत्याक तरीका एते निर्मम आ बर्बर, जकर जोड़ा इतिहास मे कम्मे हएत । आइ एहि संग्राम कें विदेशी दासताक प्रति आमजनक महायुद्धकहल जाइत छैक आ पबैत छी जे एहि महायुद्ध पर जते सामग्री एखन धरि लिखल गेल अछि आ आइयो लिखल जा रहल अछि, से कदाचित द्वितीय विश्वयुद्धक बाद दोसर नम्बर पर एकरे राखल जाएतएकर अछैत जे एहि प्रसंगक 90 प्रतिशत दस्तावेज अंग्रेज सरकार नष्ट कदेने छल । सौंसे भारत एहि सँ दलमलित छल तँ मिथिला पर एकर प्रभाव नहि पड़ल हेतै, से कोना कहल जाएत ? हमरा इलाका मे तँ किम्वदन्ती प्रसिद्ध अछि जे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ कें एही संग्राम मे अंग्रेज सरकार भीतर केने रहनि आ ओ अपन योगबल सँ जेल सँ बहरा गेल रहथि वा हुनकर शिष्य जॉन क्रिश्चियन जमानतदार बनिकहुनका छोड़बौने छलथिन । एम्हर समस्तीपुर इलाकाक बारे मे पढ़ल अछि जे युद्धक बाद, ओम्हर गामगाम मे प्रचार भगेलै जे कम्पनीक राज खतम भगेल, आब देश आजाद अछि । एहि प्रचार कें गलत साबित करबाक लेल तिरहुतक मजिस्ट्रेट डम्पियर, स्वयं अपना नेतृत्व मे सेना लकूच केने रहए आ जानि नहि कतेक हजार लोकक खून कआपस घुरल रहय । सेहो खून कोना ? बीच गाम पर गाछ मे लटका फाँसी दय मूड़ी कटबा कय अंगभंग क’, कुट्टी काटि कुकूर कें खुआ कआदिआदि । अनुमान कएल जाय जे आमलोकक मानस पर केहन गँहीर छाप पड़ल हेतै एहि दृश्य सभक!
मुदा हमरा लोकनि देखैत छी जे
सरकारसरकार प्राय: एक होइत छै, तें मिथिला सरकार (महाराज महेश्वर सिंह) अपन सक्क भरि अंग्रेज सरकार कें, विद्रोहक सफाया करैक लेल सहयोग केने रहथि । विवरण भेटैत अछि जे हुनका द्वारा 19 टा हाथी, 100 चुनौटा सिपाही, 16 टा कसगर घोड़सवार आ ऊपर सँ दू टा ऊँट कम्पनी सरकार कें प्रदान कयल गेल छल । कहब आवश्यक नहि जे अपन प्रजा पर महाराजक जबर्दस्त धाख छलनि । राजसत्ताक संगसंग धर्मसत्ता सेहो हुनका हाथ मे छलनि आ एहि ठामक जनता धर्मप्राण मानल जाइत छल ।
नवजागरणक मामला मे मिथिलाक केसस्टडी करबाक प्रसंग मे एकटा जटिलता आओर हमरा सभ कें भेटैत अछि । कोर्ट ऑफ वार्ड्स (1860–1880) प्रशासनअवधि मे, सन् 1873 ई॰ मे मिथिला मे बड़ भारी अकाल पड़लै । एहि भीषण विपत्तिक समय मे अंग्रेज सरकार अभूतपूर्व राहतव्यवस्था चलौलक । फतूर कविक कवित्त मे एकर सुव्यवस्थित वर्णन भेलैक अछि । चन्दा झा तथा परमेश्वर झा सेहो एहि मादे लिखलनि अछि । एहि सभमे एहि सुव्यवस्थाक प्रशंसा भेलैक अछि । एकरा अतिरिक्त, 1857 क बाद जे रेल, डाक आ तारक व्यवस्था प्रवर्तित कयल गेलतकर सकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़लैक, यद्यपि कि एकरा पाछू जे अंग्रेजी सत्ताक इष्ट रहैक सेहो रचनाकार लोकनिक दृष्टि सँ नुकाएल नहि रहलनि । रेल पर लिखल अपन एक कविता मे चन्दाझा कहने रहथि––‘भारतभूमि अन्न को ढोती यह कुरीति, नहि रीति भली ।’  हिन्दी मे लिखल, चन्दा झाक उक्त अप्रकाशित समुच्चा कविता एहि तरहें अछि––
जब रेल चली
कोउ वाहन न समान बली ।
हाथी हिम्मत जहाँ न घोड़ी, साँढि़न गति बिचली
जीवत लोक विमान मे बैठे देखे पृथ्वी सकल भली ।
शीत गरम श्रम अंग न व्यापे लांघ पहाड़पहाड़ भली
जोर जंगली कंगली कीन्ही छकित भयो छिति गाँह छली ।
ज्वालामुखी सखी लखि पड़ती निशिवासर तुझ हृदय जली
भारतभूमि अन्न को ढोती यह कुरीति, नहि नीति भली ।
तहिना, अंग्रेजी शासन मे विधिव्यवस्थाक स्थिति मे सुधार भेलैक, अपराधक दर घटलैक, आमलोक भयमुक्त शान्तिकालक अनुभव केलक । एहू तथ्यक विवरण हमरा लोकनि कें चन्दा झाक लेखन मे भेटैत अछि । अंग्रेजक प्रशंसा करैत एक पदमे ओ कहैत छथि––‘राजा अंग्रेज कयल नीतिक निधान ।आदिआदि ।
प्रशासनिक दस्तावेज आ एहि रचना सभ सँ सूचना भेटैत अछि जे आमलोक पर एकर सभक बहुत प्रशंसात्मक प्रभाव पड़ल रहैक आ समाज मे अंग्रेजी सत्ताक प्रति आस्था बढ़ल रहैक । आगामी महराजलोकनि एहि भाव कें सबल करबाक उद्यम सेहो करैत रहलथिन । तें हरसट्ठे प्रतिरोधक संस्कृति विकसित हेबाक प्रवृत्ति ने हम अपन मुख्यधाराक समाज मे देखि पबैत छी आ ने एतुक्का साहित्य मे । प्रतिरोधी संस्कृति जाहि अपरधारा मे छल, तकरा मुँह मे बोल भनें होअय, हाथ मे कलम नहि छल । मिथिला का इतिहासक लेखक रामप्रकाश शर्मा लिखलनि अछि जे 1857क संग्राम मे बिहार (आरा)क प्रभाव जे मिथिलाक आमलोकक स्मृति पर पड़ल छल, तकर एक बानगी चरबाह सभक एक खेलक रूप मे प्रसिद्ध अछि, जाहि मे चरबाहक एक दल पुछैत छैक––
            अमर सिंह के कमर टूटलनि, कुमर सिंह के बाँहि
            पुछियनु गदलभंजन सिंहसँ अब लड़ता कि नाँहि ?
            एहि पर दोसर दल उतारा दैत छैक––
            हाथी बेचब घोड़ा बेचब सिपाही कें खियाएब
            लड़ब नै तँ करब की, हँसी की कराएब ?
तँ, दोसर दिस पूर्णियाँ जिलाक सुदूर देहातमे कबड्डी खेलैत काल पढ़ल जायबला बोल मे एहि पदक प्रयोग आइधरि प्रचलित रहबाक चर्चा डॉ॰ रत्नेश्वर मिश्र करैत छथि––
चल कबड्डी आरा, सुलतानगंज कें मारा ।एहि पदमे सुल्तानगंज जीति लेबाक पछाति अंग्रेज सँ आरा जितबाक मंशा प्रकट कएल गेल छैक, जे कि 1857क घटना थिक ।
मुदा तें कहल जाय जे एकर प्रभाव युग बदलबा पर नहि पड़लै, से नहि । श्रेण्य साहित्य मे एकर अभिव्यक्ति बहुत बाद मे आबिकभेल । सामाजिक परिवेशक पद्धतिबद्ध अध्ययन द्वारा एकरो बहुत ठीक सँ बूझल जा सकैत अछि । कुल मिलाकमिथिला समाज मे अंग्रेजी सत्ताक प्रति मिललजुलल भाव रहैक, थोड़ेक आक्रोशो आ थोड़ेक प्रशंसो । ई प्रशंसाभाव मात्र भयजनित रहैक अथवा महाराजक धाखवश, सेहो नहि कहल जा सकैत अछि । गुणग्राहकताक जे मानदण्ड रहैक मिथिला समाजक, तदनुसार अंग्रेजी शासन कें पास मार्क अवश्य देल गेल छल । ओना, गुणग्राहकताक ई मानदण्ड सामन्ती मनोवृत्ति द्वारा अनुकूलित छल जाहि मे सम्भ्रान्त मैथिल प्रजाक परजीवी सोच स्पष्टे देखार छल, जकरा कदाचित एहि लोकोक्ति मे अकानल जा सकैत अछि– ‘खाय कहय खा ली एक लाख तकरो, बैसय कहय बैसि ली एक लाख तकरो ।अथवा––‘जय जगदीश पचे पचीस, जे दियय दहीचूड़ा तकरे दीस ।अस्तु । एकरा गुण कही आ कि दोष कही––मिथिलासमाजक बुद्धिजीवी समूह सभ दिन व्यक्तिगत लाभ आ प्राप्तियेक आधार पर गुणग्राहक होइत रहलाह । लाख अन्यायी होथु क्यो, जँ हमरा लेल ओ लाभकर छथि तँ ओ नीक छथि । ब्रह्मोत्तरसँ ल’ ‘चैअनिया खोरिसधरि तँ आखिर एही समर्थनक सरंजाम छल । हमरा लोकनि आगू जे अंगरेजी सत्ताक प्रति विद्रोहभाव बढ़ैत जाइत देखैत छिऐक अथवा सामाजिक सत्ता आ धर्मसत्ता कें जे चुनौती भेटब शुरू भजाइत छैक, से वस्तुत: एही नवजागरणचेतनाक परिणाम थिक, यद्यपि कि एकरा मिथिला मे पल्लवितपुष्पित हेबा मे आन क्षेत्रक अपेक्षा बहुत बेसी देरी लगलैक ।
अपना ओतय सामान्यतया मानल जाइत रहल अछि जे नवजागरण वा कि मैथिली जागरण अंग्रेज जाति आ अंग्रेजी भाषाक प्रभाव सँ आएल । एहि मान्यता मे प्रभावक अर्थ अनुकरण करबसँ ल’ ‘प्रेरित हएबधरि मानल जाइछ । एम्हर जे तथ्य हमरा लोकनिक समक्ष अछि से वस्तुस्थितिक एक भिन्न पक्ष दिस संकेत करैत अछि । सभ गोटे अवगत छी जे मिथिला मे प्रथम अंगरेजी स्कूल 1880 मे स्थापित भेल । बहुतो दिन धरि बुद्धिजीवी समाज मे एकरा विरुद्ध खण्डनमण्डन, वादविवाद चलैत रहल । बहुतो दिन धरि समाज असमंजस मे रहल । ओम्हर, अंग्रेजी शिक्षाक प्रसारक गति सेहो टुकदुम रहल । अंग्रेजीशिक्षित लोक कें एकरा पचाबमे सेहो समय लगलैक । एवंकारें, मिथिलाक साहित्य पर, अंगरेजीक प्रभाव पड़ल देखाब दैक, से समय अयबा मे पचास वर्ष लगलैक । आलोचक लोकनि ठीक लक्ष्य केलनि अछि जे मैथिली साहित्य पर अंग्रेजीक प्रभाव 1930 ई॰क बादे देखार भेल अछि । तें मैथिली जागरणक पृष्ठभूमि मे प्रत्यक्ष रूप सँ अंग्रेजीक प्रभाव ताकब निरर्थक थिक । दोसर मान्यता अछि अंग्रेज जाति सँ प्रभावित हेबाकई विचारणीय तँ अवश्य अछि किन्तु संश्लिष्ट अछि । हमरा लोकनि कें मोन रखबाक चाही जे मुसलमान जकाँ अंग्रेज जाति समाजक अंग बनि जेबा लेल नहि आएल छल । ओ सर्वदा अपना कें भिन्न आ पैघ मानैत छल आ सैह ओकरा सभ दिन मानैत रहबाक छलै । ओकरा सभक छवि अहंकारी, निरंकुश आ विधर्मी जातिक रूप मे छलै । जमीन्दार लोकनि आम लोकक खून चूसथि, मुदा अंग्रेज सदैव जमीन्दारेक पक्ष लैत छल, समाज ओकरा सँ दबैत छल, भय मानैत छल । एहि मनोभावक एक चित्र चन्दा झाक एकटा हिन्दी कविता मे आएल अछि । ई बात भिन्न जे एहि कविता मे आक्रोश अथवा प्रतिरोध ताकब निरर्थक थिक । उनटे तकरा बदला समर्थनक स्वर देखार पडि़ सकैत अछि, मुदा सेहो अभिधे धरि । कविता अपन मूल आशय मे अवश्ये जागरणधर्मी अछि । चन्दा झा कहैत छथि
विचारो बाबू, राजा है अंगरेज ।
चलो ऐन ओ न्यायधरम से करो मिजाज न तेज ।
कितना अन्यायी को दीन्हों कालापानी भेज ।
रक्षादक्षा पुलिस खड़ी है सदा रखो परहेज ।
भनत चन्द्र शेखी दुख देती गुपुत करेज । ।
मुदा एकटा गुण धरि ओहि जाति मे जबर्दस्त रहैक । ओकर चिन्तनपद्धति भौतिकतावादी छल । ओ शास्त्रक आगू मे शिल्प कें महत्त्व दै बला जाति छल । ओकर यैह चिन्तनपद्धति ओकर जीवनशैली सँ लशासनप्रणाली धरि देखल जा सकैत छल। एकरे दम पर ओ भारतीय संस्कृति, धर्म आ मर्यादाक खिल्ली उड़ा सकैत छल । एकरे आधारशिला पर ओ प्राच्यविद्याक सही व्याख्याकरबाक दम्भ कसकैत छल । अंग्रेज जातिक प्राच्यविद्या सम्बन्धी इंजीनियरिंगकें विख्यात विचारक एडवर्ड सईद नीक जकाँ देखार केने छथि । से मुदा भिन्न बात । मैथिली जागरणक सन्दर्भ लदेखी तँ मिथिला, जॉर्ज ग्रियर्सनक रूप मे, अंग्रेज जातिक एक सर्वथा भिन्न रूप देखलक । ग्रियर्सनक मादे सोचैत छी तँ पबैत छी जे अनुसन्धानकर्त्ता स्वभावक ओ अंग्रेज ऑफिसर मिथिलाक संस्कृति, भाषा आ साहित्य पर मुग्ध भउठल छल तथा एकर सौन्दर्य आ महत्व कें प्रतिष्ठित करबा मे अपन जीवनक एक बेस अवधि लगा देने छल । हुनक कएल काज एहि ठामक लोक कें चकबिदोर लगौलक । अपन वस्तुक प्रति लोक गर्व करब सिखलक । एही गर्व सँ उत्तरोत्तर लेखनकार्यक आवश्यकता आ उद्यम उत्पन्न भेल । एहना मे, हमरा प्रतीत होइत अछि जे मैथिलीजागरणप्रसंग मे भूमिका व्यक्तिवाची रूप सँ ग्रियर्सनक बेसी छनि, अंग्रेज जातिक कम । तें ई सम्बन्ध संश्लिष्ट अछि ।
मुदा, दोसर हिसाबें हमरा लोकनि विचार करी तँ एकटा आर दृष्टिकोण उपलब्ध होइत अछि । ई दृष्टि थिक तथ्य कें एहि रूप मे बुझबाक जे नवजागरणक आएब मिथिलाक संस्कृतिक स्वाभाविक विकास छल । मैथिलीक जे प्रथम जागरण भेल छल तकर नायक रहथि विद्यापति । मिथिला मे तँ हुनक व्याप्ति रहबे करय, सम्पूर्ण पूर्वाञ्चल कें ओ व्याप्त केने रहथि । मिथिला मे हुनक अटूट परम्परा काएम भचुकल छल । एक बात नहि बिसरबाक थिक जे विद्यापतिक गीत भने शृंगारिक आ लोकाचारपरक हो, मुदा ओकरा पावनता प्राप्त छलैक कारण ओहि मे राधाकृष्ण छला, गौरीशंकर छला, भगवती छली । एम्हर, मुसलमानी आ अंग्रेजी शासनकालक मिथिलासमाज पर जे जमीन्दारी शोषणक आतंक काएम भेलै, से लोकक धर्मधारणाजन्य आस्थाकेन्द्र कें प्रभावित केलकै । आब राधाकृष्णक प्रेमासिक्त गीत सँ समाजक काज नहि चलि सकैत छलै । मिथिला मे रामभक्ति भने सत्ता द्वारा प्रायोजित भेल होउकपाओल गेल जे लोक एकरा स्वीकारो केलक । तुलसीदासक रामायण गामगाम मे प्रचलित होअए लागल । विद्यापतिक कृष्ण भावाकुल प्रेमी छला, तनिका स्थान पर वत्सल, रक्षक आ ताड़नहार राम सामने एला । अवधी आ ब्रजभाषाक संग मैथिलीक मिश्रण सँ सधुक्कड़ी भाषाक विकास भेल । रामलीला आ पारसी थियेटर चलन मे आबि गेल । समाजक मान्यता मे सेहो अनेक परिवर्त्तन भेल । एहना स्थिति मे, इतिहासबोधक संग भाषासंस्कृति कें बूझबला लोक मे सक्रियता आ चेतनता आएब एक स्वाभाविक प्रक्रियाक परिणति छल । ग्रियर्सनक गुणग्राहकता एहि प्रक्रिया कें तेज केलक, से धरि अवश्य कहल जा सकैत अछि ।
एहि हिसाबें देखी तँ चन्दा झाक भूमिका कमोबेश ओही तरहक देखार दैत अछि, जेहन अपना समय मे ज्योतिरीश्वरक छलनि । विशृंखलित मैथिली चेतना कें ओ एक मंच प्रदान करहल छला । तकरा पृष्ठभूमि मे ओहि कालक सामाजिकराजनीतिक स्थिति छलैक जे समाज कें अपन आस्थाक केन्द्रबिन्दु बदलबाक लेल बाध्य करहल छलैक । एही प्रकारक काज चन्दा झाक समक्ष छलनि । दुनू गोटे अपनाअपना तरहें परकें मान देबाक ओकालति करहल छलाज्योतिरीश्वर जँ ब्राह्मणेतर जनसंस्कृति कें अनुशासन प्रदान करहल छला तँ चन्दाझा मैथिलेतर धर्मधारणा आ चिन्तन पद्धति कें अभिसिक्त करहल छला। आस्थाक केन्द्र बिन्दुक परिवर्त्तित हेबाक जे संकल्पना हम सुरुहे मे रखलहुँ से दुनू ठाम देखल जा सकैत अछि । तखन ई बात ध्यान राखब आवश्यक जे चन्दा झाक युगीन सोच आ कर्त्तव्यक्षेत्र अत्यन्त व्यापक छलनि एकरा पाछू नवजागरणक ठोस तत्त्व छलैक, आ तें एकर परिणतियो भिन्न भेल ।
मुदा, मिथिला मे नवजागरण, एतुक्का संस्कृतिक स्वाभाविक विकास छल––एहि तथ्यक पुष्टि लेल पर्याप्त सामग्री हमरा सभ लग उपलब्ध नहि अछि । हमरा लोकनि आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसॉफिकल सोसाइटी आदिक मादे आवश्यकता सँ बेसी सोचैत रहल छी । मानसिक रूप सँ भारतक इतिहास पर पूर्णत: निर्भर भगेल छी, बिना एहि बिन्दु कें अख्यासने जे भारतक इतिहास मे मिथिलाक इतिहास कतेककोना छैक । हमरा लोकनिक देसमे जे धर्मसुधारक भेलाह, सामाजिक आचारव्यवहार मे नवाचारक आग्रही भेलाह––हुनका लोकनि कें तत्कालीन राजसत्ता आ धर्मसत्ता मान नहिञे देलक, हमहूँ लोकनि हुनका कतियौनहि रहलहँु आ तत्कालीन समाज पर पड़ल हुनका लोकनिक प्रभाव दिस सँ आँखि मुनने रहलहुँ । हमर विश्वास अछि जे एहि तथ्यक खोज केने सँ मैथिल संस्कृतिक स्वाभाविक विकासक रूप मे नवजागरण कें चिह्नित कएल जा सकैत छैक । एकाधटा दृष्टान्त हम एतए राखचाहैत छी ।
अठारहउनैसम शताब्दी मे विख्यात आध्यात्मिक गुरु लक्ष्मीनाथ गोसाँइ भेल छला । हुनक जन्म कोशीक्षेत्र मे 1787 मे भेल रहनि आ निधन 1872 मे । ओ निविष्ट कुलक मैथिल ब्राह्मण रहथि आ तत्कालीन वैष्णवभक्तिसम्बद्ध नाथसम्प्रदाय मे दीक्षित भसंन्यासी भगेल रहथि । मिथिला आ नेपालक दर्जन सँ बेसी गाम मे ओ अपन कुटी बनौने रहथि । ओतुक्का लोक मे हुनका प्रति अनन्य आस्था आ सम्मान छलनि । हुनकर मान्यता सभ पर जँ ध्यान दी तँ अद्भुत रूप सँ नवजागरणक तत्त्व हुनका मे देखाब दैत अछि । ओ जातिप्रथाक विरोध केलनि, धार्मिक वाह्याडम्बर, सामाजिक रूढि़, अपकर्षक लोकाचारएहि सभ कथूक वर्जन करैत ओ एक एहन मानवतावादी समाजक अवधारणा प्रस्तुत केलनि जाहि मे सभ क्योक लेल स्थान छल । हुनक एक शिष्य जँ राजाराम शास्त्री (प्रयाग) छलथिन तँ दोसर मोहम्मद गौस खाँ (मुंगेर)य हुनक एक उत्तराधिकारी जँ रघुवर झा (तरौनी) भेलथिन तँ दोसर क्रिश्चियन जॉन (बरियाही कोठी) । मने सभ जाति, सभ धर्म बराबर हो । नवाचारक आग्रही हेबाक अछैत जँ व्यापक समाज हुनका सम्मान देलकनि आ मन्दिर स्थापित कपुजलकनि, तँ कोना नहि मानल जाय जे आमजन नवजागरणक चेतना सँ अनुप्राणित छल । ऊपर कहबे केलहुँ जे किम्वदन्ती अछि जे 1857 क विद्रोह मे कम्पनी सरकार हुनका गिरफ्तार केने रहनि । किएक केने हेतनि ? किछु तँ छल हएत हुनका मे जे अंग्रेज सरकार कें सूट नहि करैत हेतै। आर्य समाजक संस्थापक स्वामी दयानन्दक मादे सेहो सूचना भेटैत अछि जे विद्रोहक अवधि मे ओ तीन बर्ख धरि अवधप्रान्तक आम लोक कें अंग्रेजक विरुद्ध गोलबन्द करै मे लागल रहल छलाह । हमर अनुमान अछि जे मिथिला मे एहन अनेक लोक भेलाह जे विभिन्न मुद्दा कें लअलगअलग क्षेत्र मे नवजागरणक काज केलनि । जेना, कोशिएक इलाका मे अठारहम शताब्दी मे कारू खिरहरि भेला जे पशुरक्षा कें मुद्दा बनाकजनसंगठन काएम केलनि (एहि ठाम मोन पाड़ी चन्दा झाक पद––‘गैया जगतक मैया हे भोला कटय कसैया हाथ । हाकिम भेल निरदैया हे भोला कतय लगायब माथ । ।) एक दिस जँ ओ तांत्रिक पतनशील कर्मकाण्डक विरुद्ध संघर्ष केलनि तँ दोसर दिस ब्राह्मण धर्म पर बर्बर वर्चस्वक विरुद्ध लड़लाह । हुनका पर काज हएब एखन बाँकी अछि ।
ई तँ भेल एहन लोकक वृत्तान्त, जनिका महापुरुष मानल गेलनि । एम्हर, अठारहम शताब्दीक उत्तरार्ध मे आमलोकक जे स्थिति छल, तकरा बहुत दारुण कहल जा सकैत अछि । एहू सम्बन्ध मे एखन धरि बहुत कमे काज भपौलैक अछि आ तकरो एक छोटे अंश हम देखि सकल छी । देखैत छी कोर्ट ऑफ वार्ड्सक प्रशासनावधि मे भने जते सुधारकार्य भेल होउक, आगू महगी, शोषण आ असुरक्षाक स्थिति बढि़ते चलि गेल । चन्दा झाक पद सभ मे एकर झलक देखि सकैत छी । एक ठाम ओ लिखैत छथि
            सुखि देखैछि दूइ गोल चोर ओ भिखारि ।
            बहुत खर्च बाढि़ बन्धुबन्धु बीच मारि । ।
महगीक वर्णन करैत ओ कहैत छथि ––
            मरीच भाव अन्न भेट, से जनेर गोट ।
            उपायहीन लोककें सुखाय गेल भोट । ।

            दूध ओ दही नहीं स्वकण्ठ कें सुखाउ ।
            अन्न ई महार्घ तँ जनेर कीनि खाउ । ।
कचहरी आ तहसीलदार मे व्याप्त भ्रष्टाचारक व्यंग्यचित्र चन्दा झाक एहि अप्रकाशित हिन्दी कविता मे देखल जा सकैत अछि––
पटु पटवारी धरम धुज तहसिलदार अमीन
सत्य धर्मव्रत जगत को इनको दया अधीन ।
इनको दया अधीन तीन वंचक नहि होता
कहीं न लेता घूस, स्वामि को सत्व न खोता ।
भनत चन्द्र यह सुखी सदा परवित्तविहारी
कपट न कागज लिखत होत जो पटु पटवारी ।
तहिना, अंग्रेज जबाना मे सम्पन्न केडेस्ट्रल सर्वे मे जे जमीन हथियेबाक, विपन्न लोक कें आर अधिक विपन्न देबाक जे अभियान चलल छल, तकरा बारे में चन्दा झा अपन एक पद मे कहैत छथि––
घरघर चिन्ता अन्न को कौन सुने दुख कान
ता पै बन्दोवस्त नव भयो चहत भगवान
भनत चन्द्र आनन्द कहाँ जिब काँपत थरथर
भजनभाव को छोड़ नाम की चर्चा घरघर ।
एहिठाम महँगी, भ्रष्टाचार आ शोषणक चित्र साफसाफ देखल जा सकैछ । मोन रखबाक थिक जे चन्दा झा राजदरबारक लोक छला, जकर बनाओल तन्त्र द्वारा शोषण होइत छल, तें हुनका कविता मे शोषण आ अन्यायक साफसाफ चित्र नहि भेटत । एकर आकलन, इतिहासकार आ समाजशास्त्री लोकनि मिथिलाविषयक अपन गम्भीर अ/ययन सभ मे जे प्रस्तुत केलनि अछि, तकरा आधार पर करपड़त । बन्धुबन्धुक बीच मारि भेला पर मामला कचहरी पहुँचैत छलैक । कचहरी कम्पनी सरकार द्वारा बनाओल कानूनक आधार पर फैसला करैक । मामला किए कचहरी जाइत छल ? कारण छलै जे समाज टूटि रहल छल । प्राचीने काल सँ चलि आबि रहल ग्रामीण पंचायतव्यवस्था छिन्न भिन्न गेल छल । बाहुबली आ अपकर्मी लोक एकर परवाहि नहि करैत छल । 1836 ई॰ मे राजाराम मोहन राय लिखने छला जे गाम गाम कचहरीक दलाल पसरि गेलैक अछि, ओ सभ बड़ चतुर होइए, ओकर सभक एक विशिष्ट वर्ग बनि गेलैक अछि । ओ सभ किसान कें आतंकित केने रहैए––लोक कें मुकदमेबाजी दिस प्रेरित करैए––ककरो जिता सकैए, ककरो हरा सकैए ।भ्रष्टाचारक जे स्थिति छलै, तकर वर्णन तँ चन्दा झा सेहो केने छथि । लगानवसूलीक लेल पदस्थापित जे हाकिम होअए, सैह न्यायाधीश सेहो होइत छल, जखन कि सभ झंझटिक जडि़ मे ई लगानवसूली आ बेगारे छल । सहज स्वाभाविक छल जे जमीन्दारक अनहित हो, एहन फैसला हाकिम लोकनि नहि दसकैत रहथि । फैज अहमद फैजक एक पद ओहि कालखण्डक मिथिला पर पूरेपूरी लागू भसकैत छलैक––
बने हैं अहलेहबश मुद्दई भी मुंसिफ भी
किसे वकील करें किससे मुंसफी चाहें ।
अंग्रेजी राजक न्यायव्यवस्था पर व्यंग्य करैत चन्दा झाक ई अप्रकाशित हिन्दी कविता देखल जा सकैत अछि––
कचहरी देवी, सोच है तेरा नाम ।
अन्यायी को दण्ड देती हो नाहीं करे सलाम
जो कोई नीति रीति से चलता वाको सुख परिणाम ।
कारागार मे सोइ जात है, करत व्यर्थ संग्राम
सत्वर पुलिस कैद कर लाती बन्धन लोहा चाम ।
कहू को धन धाम ग्राम हाकिम करत लिलाम ।
कहीं बहस करता बारिस्टर लेता पूरा दाम ।
जाको व्यसन बढ़ा लड़ने का परमेश्वर तहँ वाम
भनत चन्द्र कवि दण्डनीति को बारम्बर प्रणाम ।
एक बेर प्राय: 1836 मे राजा राममोहन राय कें कम्पनीसरकार द्वारा पूछल गेलनि जे गामक किसान सभ लग मे एहन कोनो उपाय छैक जे ओ सभ थोड़े पूँजी जमाकपाबय’, तँ ओ प्रतिवेदित केने छलथिन––‘किन्नहु नहि । जाहि साल फसिल नीक होइ छै, अन्न सस्त भजाइ छै, ताहि साल किसान कें अपन समुच्चा उपजा एहि दुआरे बेचि देबपड़ैत छैक जे ओ जमीन्दारक लगान चुकता कसकय आ तखन ओकरा मेहनतमजूरी कसाल गुदस्त करपड़ैत छैक । जाहि साल फसिल कमजोर रहैत छैक, तहिया अन्नक अकाल पड़ल रहैत छैक, एहि स्थिति मे थोड़बे अनाज ओ अपना लग राखि पाबैए, जाहि मे ओकरा अपनो निमहब कठिन भेल रहैत छैक ।1
अपन एक पद मे चन्दा झा रुपैया देवीक स्तुति करैत कतेक गहन व्यंग्य करैत छथि, एहि ठाम देखि सकैत छी––
रुपैया देवी विनती करउँ प्रणाम ।
सकल विरोध मूल है तुम ही, तुम मारण संग्राम
गोवध आदि अनर्थ करावे, तु ही बिचावे चाम ।
तुम ही तार, रेल, कलमाता बारुद तोप तमाम
शहनशाह बल साहस तू है भनत चन्द्र कवि नाम ।
अस्तु देखैत छी जे आमलोकक जे स्थिति छल तकरा बहुत दारुण कहल जा सकैत अछि । जतबे जे उद्योग छल ताहू मे दिनानुदिन ह्रास भरहल छल आ कृषिकर्म पर निर्भर लोकक प्रतिशत बढ़ले जा रहल छल ।2  युगीन परिस्थितिक कारण यजमानी वा पसारीप्रथा (जाहिमे हजाम, बढ़इ, धोबि आदिक यजमानी चलैत छैक आ सालाना पारिश्रमिक भेटैत छैक) समाप्ति दिस अग्रसर भचलल छल ।3 दोसर दिस देखैत छी जे प्रतिरोधक संस्कृति सेहो नहुँनहुँ बढि़ रहल छल । महाराजक सत्ता कें सेहो चुनौती भेटलागल छल । अठारहम शताब्दीक आरम्भे मे कोशी अंचलक मैनेजर वीरू खबास कर पठाएब बन्न युद्धक घोषणा कदेने छलनि जनिका बहुत कठिनाइ सँ महाराज राघव सिंह परास्त केने छला ।4 निम्नवर्ग मे जातीय गठबन्ध आ एकता कायम होअय लागल छल । एकर एक पक्ष वीरू खबासक उपर्युक्त घटना मे देखल जा सकैत अछि तँ दोसरो पक्ष एहि समाज मे चालू संस्कृतीकरणक प्रक्रिया मे पाओल जा सकैत अछि । निम्नवर्गक अनेको जातिक लोक जनउ पहिरब शुरू कदेने छल आ कतेको पण्डित एकर समर्थन केने छलाह । एहि मुद्दा पर प्रबल सामाजिक संघर्ष भेल छलैक जकर प्रतिध वनि तीन दशक आगू प्रकाशित होइबला मैथिली पत्रिका सभ, यथा मिथिलामोदमे सेहो सुनल जा सकैत अछि । एकरो आरम्भ हमरा लोकनि कोशिएक अंचल सँ होइत देखैत छी ।5
परिवेशक कठिनताक तँ माँग रहैक जे लोक मे आर्थिक संकटक विरुद्ध वर्गीय चेतनाक उदय हो, किन्तु मिथिला मे ई समय एबा मे बहुत देरी छल । तत्काल तँ लोक अपन सामाजिक समस्याक निराकरण कलेबचाहैत छल । एकर अभिव्यक्ति छल जातीय संगठन सभक निर्माण, जकर अंकुरण तँ मिथिला मे, संस्कृतिक स्वाभाविक विकासक रूप मे होइत देखाइत अछि, मुदा बाद मे अंग्रेजक प्रेरणासँ एकरा औपचारिक मंच प्रदान कएल गेलैक ।

(2008)
सन्दर्भ :
1– भारतीय साहित्य की भूमिका : रामविलास शर्मा : पृष्ठ–328 मे उद्धृत
2– विशेष सन्दर्भ लेल देखी, आधुनिक भारत का आर्थिक इतिहास : सव्यसाची भट्टाचार्य
3– उपनिवेशकालीन मिथिलाक गाम ओ निम्नवर्ग : डॉ॰ हेतुकर झा : पृष्ठ–30
4– विशेष विवरण लेल देखीउपर्युक्तपृष्ठ–15

5– विशेष विवरण लेल देखीउपर्युक्त पृष्ठ–15 तथा आधुनिक मैथिली साहित्यक भूमिका : डॉ॰ अमरनाथ झा