Sunday, 26 October 2014

बहुल कामिनी एकल कन्त-(भाग-१)

डा. रमानन्द झा रमण

डा. रमानन्द झा रमण
आजुक मैथिल ई कहैत छथि,
स्त्री पढ़थि से पापे थिक
अधिकारहीन कर्त्तव्यहीन,
हम मूक, पंगु भऽ  बैसल छी
आब चलू कोना, से कहू अहाँ,
तेँ अहीक शरणमे आएल छी ।’.......
जयन्ती देवीक कविताक उद्धृत पंक्तिमे मिथिलाक  नारीहृदयक व्यक्त व्यथा भौतिक सुखोपभोगक  अभावजन्य नहि, अपितु नारीसमाजकेँ शिक्षाक  अधिकारसँ वंचित करबाक पुरुषपातक मानसिकताक  विरुद्ध आक्रोशक  अभिव्यक्ति थिक । मिथिलामे नारी शिक्षाक एहन दुर्गति कोना भए गेल, तथा ओहिसँ कतेक प्रकारक कुप्रथाक आखेट ओलोकनि होइत गेलीह, से बूझबा लेल  मिथिलामे नारीशिक्षाक  स्थितिकेँ चारि कालखण्डमे विभाजित कए, देखि सकैत छी । ओ कालखण्ड थिक – 1. वैदिककाल, 2. बौद्धकाल, 3. मुस्लिमकाल आ’ 4. उपनिवेशकाल । एहिमे प्रथम दू खण्डक चर्च स्वल्पहिमे अछि ।
1. वैदिक काल
वैदिक कालमे स्त्री एवं पुरुषकेँ समान सामाजिक प्रतिष्ठा छलनि । बालविवाहक प्रथा नहि छल । विधवा विवाह अमान्य नहि छल ।
Minna G. Cowan, The Education of the Women of India, 1912, New York, Page No. 29. - 'In the early Vedic times women apparently enjoyed an equal status with men. There was no child marriage, no seclusion in the zenana, no sati, no prohibition of the remarriage of widows. Ladies of culture composed hymns and performed sacrifices as men did. Some even remained unmarried and had their share of the paternal property. There are many passages in the Brahmanas which show the high esteem in which women were held.'
एकसँ बढि़ एक महान विदुषी छलीह । हुनकालोकनि द्वारा निर्मित अनेक ऋचा उपलब्ध अछि । पुरुषे जकाँ स्त्रीसमाजकेँ सेहो यज्ञक अधिकार प्राप्त छलनि ।
Dr. Jata Shankar Jha, Education in Bihar, K.P.Jayaswal Research Institute, Patna, 1979. P. No. 23 - 'The education of women is not a new thing in India. We have a brilliant tradition of educated women. Gargi, Maitreyi, Bharti, Lakhima and Bishwas Devi are some of the most illustrious names in this respect.'
2.  बौद्धकाल
बौद्धधर्म राज्यसम्पोषित धर्म छल । ओकर उत्तरकालमे अनेकहु विकृति आबि गेलैक । छोटछोट बालिका सभक अपहरण कए योगिनी बनाओल जाए लागल । कुमारि लोकनिक शरीर बौद्ध साधकक लेल परमानन्द प्राप्तिक एक सहज माध्यम बनि गेल । सुरक्षात्मक उपायक रूपमे समाजक समक्ष बालविवाह एक मात्र विकल्प छल । तत्कालीन समाजमे आठ वर्षक बालिकाकेँ गौरी आनओ वर्षक कन्याकेँ रोहिणीक मान्यता भेटल- अष्ट वर्षा भवेद् गौरी, नव वर्षा च रोहिणी । दश वर्षा भवेत् कन्या, अत उर्ध्व रजस्वला ।”  रजस्वला बेटीक विवाह मातापिताक लेल महापापक कारण मानि लेल गेल । एक समयक ई सुरक्षात्मक उपाय परवर्तीकालमे सामाजिक कुरीतिक कारण बनल । कुमारिल भट्ट एवं उदयनाचार्य सन मिथिलाक दार्शनिक बौद्धमतक दर्शनक स्तरपर खण्डन कएल । आदिशङ्कराचार्यक एहि क्षेत्रमे महती भूमिका छलनि । सनातनीक निरन्तर प्रयाससँ बौद्धमठ पुन: शिवमन्दिर भेल । बौद्ध संन्यासी शैव बनैत गेलाह –
E.T.Atkinson, Notes on the history of Religion in the Himalaya of the N.W. Provinces, Journal of the Asiatic Society of Bengal, 1884 - 'Buddhism was originally a protest against sacerdotalism, not necessarily against the Brahmanical caste, but it too succumbed to daemonistic influences, and degraded and corrupted, fell an easy prey to its rival Brahmanism. Both sought the popular favour by pandering to the vulger love of mystery, magical mummeries, superhuman power and the like, and Brahmanism absorbed Buddhism rather than destroyed. The Buddhist fanes became Shaiva temples and the Buddhist priets became Shaiva ascetics or served the Shaiva temples.'
शिवपरिवारक परिकल्पनासँ बौद्धधर्मक प्रति विकर्षण भेलैक तथा पारिवारिक जीवनक प्रति आस्था जागल । बौद्धकालमे स्त्रीशिक्षाक भेल ह्रासक प्रसङ्ग अरुन्धती देवी लिखने छथि
सनातन धर्मावलम्बीक हृदय काँपि उठल, धार्मिकताक अढ़मे बौद्धधर्मावलम्बिनीक व्यभिचार प्रारम्भ भेल, तकर कारण स्त्रीशिक्षैकेँ लोक बुझय लागल, स्त्रीशिक्षामे क्रमिक शिथिलता अभिव्याप्त भेल ।
3. मुस्लिमकाल
तुर्कअफगानमोगलक आक्रमण एवं शासनकालमे लूटपाट आबलात धर्मान्तरणसँ सामाजिक जीवन अत्यन्त असुरक्षित भए गेल । विद्यापतिक  पाँती छोटओ तुरुका भभकी मारतत्कालीन मिथिलाक  सामाजिक एवं राजनीतिक स्थितिक द्योतक थिक । एकर सबसँ बेसी प्रभाव महिलासमाजपर पड़ल । एहि प्रसङ्ग बड़ौदाक महारानीक निष्कर्ष ऐतिहासिक रूपसँ मिथिलाक महिलासमाजक लेल सेहो ओहिना सत्य अछि-
Her Highness the Maharani of Baroda, The Position of Women in Indian Life, 1912- " Our land became a prey to external invasion and internal strife, and in the ceaseless struggle that was waged , the cause of learning, and with it that of woman, was forced to the wall. The arts of peace had no room to expand, and with the constant warfare that devasted India in the seventeenth and eithteenth centuries, woman's interest and education fell into depth of miserable neglect and supression, from which they are only now recovering."
आक्रान्ता शासक भए गेल । ऐतिहासिक कारणसँ ओहि वर्गमे पर्दाप्रथा छल । एहि सन्दर्भमे एमजीकोवन विस्तारसँ लिखने छथि-
Minna G. Cowan, The Education of the Women of India, 1912, New York, Page No. 33.- “With the Moslem conquests came parda system with its withering influence. Devised by Mohammed, according to modern Moslem historians, for the protection of women in wild and lawless times, it has inculcuted distrust of their character and capacities. In spite of the fact that many Indian women today look upon the parda as a sign of prestige and their value in their husband's eyes, the thoughtful observer must reckon it, in its ultimate social influence, as a symbol of distrust.”
शासक  वर्गक रहनसहन, आचारविचार शासितक  आदर्श भए जाएब अस्वाभाविक  नहि अछि । अतएव,शासकक निकटस्थ लोकमे, जे निश्चित रूपसँ सुखीसम्पन्न रहल होएताह, पर्दाक प्रचलन भेल । बादमे ई प्रतिष्ठाक सूचक बनल । एहि प्रसङ्ग अरुन्धती देवीक कहब अछि –‘आततायी बलवान् मोगलपैठानक द्वारा हिन्दूक आदर्शपुस्तकमाला अग्निक प्रबल ज्वालामे स्वाहा होमय लागल, शिक्षाक बदला प्राणभिक्षा प्रारम्भ भेल, सतीत्वरक्षाक  हेतु ‘‘पर्दा’’ प्रथा आओर प्रबल भय गेल, स्त्रीगणकेँ ककरहुसँ भरिमुह बजबौक सौभाग्य अकस्माते प्राप्त होइत छल । एहन संकटापन्न स्थितिमे उच्चकोटिक शिक्षालाभ अति दुर्लभ नहि तँ सुलभो नहि छल ।
पर्दाप्रथाक  दोसर कारण राजकीयोत्पातसँ सुरक्षित रहब छल । बादशाहक स्त्रीगुप्तचर एवं सिपाही कन्याक  अपहरण करए लागल । एहन राजकीयोत्पातक वर्णन मैथिलीक ऐतिहासिक उपन्यास चामुण्डा’ (लक्ष्मीपतिसिंह रचना सञ्चयन, संडारमानन्दझा रमण, साहित्य अकादेमी, 2012 ई.)मे भेटैत अछि । मिथिलाक महान दार्शनिक  वर्द्धमान उपाध्यायकेँ अपमानित कए शास्त्रचिन्तनसँ विरत करबा लेल हुनक तीनू कन्याकेँबादशाहक सेनापति द्वारा बन्दी बनेबाक प्रयास भेल । निर्भीक चामुण्डा द्वारा कारण पुछलापर सेनापति हँसिकेँ कहैत छनि –‘अपराधतपराध की ? सिर्फ़ अहाँ तीनूक वेहद खूबसुरती ! देखू, खुद शाहंशाह अहाँ तीनूक ख्वावेइश्कमे अपन जान तक कुरवान करबा लै तैआर छथि । तब, फेर बाते की ? चलै ने चलू, ई तँ तकदीरक खूबी.... ।मिथिलाक लोकक जिह्ववापर ओ घटना अद्यावधि विराजमान अछि । आजाहि स्थलसँ अपहरणक प्रयास भेल छल, ततय सैकड़हु वर्षसँ चामुण्डा मन्दिर अछि । लोक पूर्ण आस्था एवं भक्तिभावसँ पूजाचर्चा करैत अछि ।
साहित्यक आधारपर मिथिलाक समाजमे नारीक स्थिति
साहित्यमे चित्रित जीवनक आधारपर तात्कालिक समाजक चित्र सहजतापूर्वक ज्ञात भए जाइत छैक । मिथिलामे नारीक स्थिति केहन छल, मैथिलीक शिष्ट एवं लोक साहित्यक आधारपर संक्षिप्त लेखाजोखा प्रस्तुत अछि ।
शिष्टसाहित्य
मैथिलीक प्राचीनतम उपलब्ध सिद्ध साहित्यमे स्त्रीशरीरक महत्त्व अछि । ओ हुनका लोकनिक साधनाभूमि थिक । ज्योतिरीश्वर कालीन मिथिलामे नारी घोर अन्धकारक पर्याय छथि- {डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी/ बबुआजी मिश्र (सं.), ज्योतिरीश्वरकृत  वर्णरत्नाकर, तृतीय कल्लोल –“पाताल अइसन दुःप्रवेश. स्त्रीक चरित्र अइसन दुर्लक्ष्य. कालिन्दीक कल्लोल अइसन मांसल. आतङ्कक नगर अइसन भयानक} धूर्तसमागममे  जखन गुरु (विश्वनगर)  एवं शिष्य (स्नातक)मे अनङ्गसेना(तरुणी वेश्या)पर अधिकारक हेतु विवाद भए जाइछ तँ ओ पञ्चैतीक लेल असज्जात मिश्रक ओतय पहुँचैत छथि । असज्जात मिश्र अनङ्गसेनाकेँ पाञ्जरमे बैसाय निर्णय करैत छथि- हमरिए हमरा लग अछ बैसलि, परतष हलिअ विचारी ।हमरा लग बैसलि अछि तेँ अनङ्गसेनापर हमर अधिकार अछि । एहिसँ स्पष्ट अछि, ओहिकालमे नारीक अपन कोनो व्यक्तित्व नहि छलैक । ओ एक मात्र बिकाउ सामान छल । हस्तान्तरणीय समान जकाँ उपयोग होइत छलैक । विद्यापतिक गीतक अनुसार तत्कालीन मिथिलामे तीन प्रकारक वैवाहिक कुप्रथा छलैक बहुविवाह, वृद्धविवाह एवं अनमेल विवाह । विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटकमे राजाक सङ्ग अनेक स्त्रीक रङ्गरभसक क्रममे गाओल जाइत गीत बहुल कामिनि एकल कन्तसमाजमे व्याप्त बहुपत्नीत्वक द्योतक थिक -
खेल नरपति युवती सङ्गे, काहु आलिङ्गए, काहु निहार
काहु लिलोपन मलाञे मार, काहु बुझाव विसेषि सिनेहि
पुलके मुकुल मण्डित देह, बहुल कामिनि एकल कन्त
कृष्णपति आएल सयन तन्त ।”-– उमेश मिश्र/जयकान्त मिश्र (सं–) विद्यापतिकृत गोरक्षविजय, पृष्ठ सं– 7, 1961 ई.
विद्यापतिक एक गीतमे मैना कहैत छथिन जे जँ बूढ़ जमाय भेल तँ आङनमे नहि रहब (हम नहि आजु रहब एहि आङन जँ बूढ़ होएत जमाय।) आदोसरठाम बूढ़क विवाहिता अपनाकेँपापिन-धोछीकहि दुख प्रकट करैत अछि, (विद्यापति गीत समग्र, सम्पागोविन्द झा,  CIIL,Mysore)
पेट पचकल गाल चोटकल पाकल भौंहेरि गोछी
ताहि बुढ़ा हाथ ई विधि देलहुँ, ते मोञे पापिन धोछी
माए न सोचल बाप न खोजल खोजल देव अपने
विहिक लिखल मेटि न पाबिअ भाखिअ मनहि मने
भन विद्यापति सुन पारवति ई वर त्रिलोक देवा/ जगत इसर सामि तोहि मिलु कर जोरि करू सेवा ।फेर अन्यत्र अछि
पियामोर बालक हम तरुणी गे, कोन तप चुकलहुँ भेलहुँ जननी गे’-
पिया मोर बालक हम तरुणी । कोन तप चुकलहुँ भेलहुँ जननी ।
पहिरि लेल सखि दछिनक चीर । पिआकें देखैत मोर दगध सरीर ।
पिआ लैली गोद कए चलली बजार । हटिआक लोग पूछे के लागु तोहर ।
नहि मोर दिओर कि नहि छोट भाए । करम लिखल छल तोहर जमाइ ।
बाट रे बटोहिआ कि तोंहु मोरा भाइ । हमर समाद नैहर लेने जाइ ।
कहिअनु बाबा कें किनए धेनु गाए । दुधबा पिआइकें पोसता जमाए ।
नहि मोरा टाका अछि नहि धेनु गाए । कोन बिधि पोसब बालक जमाए ।
भनहि विद्यापति सुनु ब्रजनारि । धैरज धए रहु मिलत मुरारि ।‘’-विद्यापति गीत समग्र, पृसं– 505, संगोविन्दझा,CIIL Maysore.
ई केवल कवि कल्पना नहि भए सकैत अछि । जेना कहल जाइत अछि, धुआँ अछि तँ आगि अवश्य होएत । निश्चित रूपसँ विद्यापतिक समयमे अनमेल विवाहक प्रचलन एहू रूपमे छल होएत । कालान्तरमे एहन उदाहरण नहि भेटैत अछि । मुदा सबसँ पैघ बात अछि समाज अपन गलतीकेँ  नुकेबा लेल एक ठाम राजाकेँ भगवानक रूप आबूढ़ वरकेँ शिवक रूपमे कहि बोलभरोस दैत अछि । अन्ततः इएह सिद्ध होइछ जे समाजमे स्त्रीक स्थान सम्माननीय नहि, भोग्येक छल ।
लोक साहित्य
क. लोकगीत
लोकगीतमे लोक मानसक छवि अंकित रहैत अछि । लोक परम्परा एवं सामाजिक धारणा अभिव्यञ्जित रहैत अछि । ओहि आधारपर समाजक स्थिति की छैक, व्यक्तिव्यक्तिक  बीचक सम्बन्धक स्तर एवं ओहिमे आत्मीयता कतेक छैक, माइबापक अपनहि सन्तानक लेल भावात्मक सम्बन्ध एक समान किएक नहि होइत छैक, आदि सामाजिक वा पारिवारिक स्थितिक अन्त: साक्ष्य स्वत: लोकगीतक माध्यमे भेटि जाइत अछि । उदाहरणस्वरूप, बेटा आबेटीक जन्मपर घरक वातावरणमे होइत अन्तरकेँ  देखि सकैत छी । एको सोहरमे सीता, लक्ष्मी, राधा, गौरीक जन्मक उल्लास नहि अछि, सभठाम कृष्ण भेटताह, राम भेटताह । जेना अवतरु नन्दकिशोर, विभूषितकुण्डल, हे ललना। छठिआरोमे साठि गोसाउनिक आवाहन पुत्रेक सुरक्षाक लेल होइत अछि (छठम दिन छठिआर, नगर हकारल हे, ललना, होरिला विविध प्रकार, ननदो ओङरल हे, साठि गोसाउनि आबि, सौरि भय बैसथु, हे ललना’– श्यामानन्द झा, ‘व्यावहारिक गीतचन्द्रिका’, 1932 ई.) पुत्रक जन्मपर भेल उल्लासक ई सभ अभिव्यक्ति थिक । साठि जे स्वयं नारीस्वरूपा छथि कन्याक सुरक्षाक लेल प्राय: नहि छथि । स्पष्ट अछि जे कन्याक अपेक्षा माइ पुत्रक प्रति बेसी स्नेहशील छथि । दोसर दिस कन्याक जन्मपर परिवारमे ओहिना अप्रसन्नता व्याप्त भए जाइछ, जेना एकटा छिन्ना लता मौला जाइत अछि । मैथिली लोकगीतमे समाजक एहि अन्तर्विरोधक उद्घाटन पूर्ण मार्मिकताक सङ्ग भेटैत अछि । जेना, कन्याक जन्मपर सासुननदिक कोन कथा पतिओक मुह लटकि जाएब-
जाहि दिन आगे बेटी तोहरो जनम भेल, धरती उठल झझकाइ हे ।
हँसुआ खोजइते गे बेटी छुरियो न भेटल, सितुआसँ नार कटाओल हे ।
सासु ननदी गे बेटी मुखहुँ न बोलए, स्वामी जीकेँ जियरा उदास हे ।
कन्या नवजातक नार काटबा लेल छूरी नहि भेटब, अन्तत: खुरचनसँ नार काटल जाएब (हँसुआ खोजइते गे बेटी छुरियो न भेटल, सितुआसँ नार कटाओल हे’) एवं कन्याक जन्मसँ  परिवारमे माइक जे उपेक्षा होइत छैक एवं मानसिक यातना भेटैक रहैत छैक ओहिसँ मुक्तिक लेल भ्रूणहत्याक भाव मनमे आएब (पहिले जे जनितउँ धिया रे जनम लेत, खएतउँ मरिच पचास हे । मरिचक झाँससँ धिया दुरि जाइत, छुटितइ धियाक संताप हे’) । समाजमे नारीक प्रति एही उपेक्षाभावक परिणति सम्प्रति सोनोग्राफी द्वारा भ्रूणपरीक्षण आफेर हत्या थिक । पुत्राऽर्थे कृयते भार्याओही मानसिकताक अभिव्यक्ति थिक ।
ख. लोकगाथा
लोकगीतहि जकाँ लोकगाथामे सेहो नारी उपेक्षित एवं अपमानित छथि । एकर उदाहरण अछि राजा सलहेस15 नायिका दौना मालिन । दौना मालिनिकेँ जखन ज्ञात होइत छनि जे राजा सलहेसक पहरेदारीमे राजमहलमे भेल चोरिक कारणेँ मुसुक बान्ह बान्हि यातना देल जाइत छनि तँ ओ तत्काल उपस्थित भए राजासँ राजा सलहेसकेँ छोडि़ देबाक निहोरा करैत छथिन आकहैत छथिन जे आठ दिनक भीतर चोरि गेल माल उपरा देब । राजाक दिवानकेँ तँ सहजहिं राजाकेँ सेहो, दौना मालिनिपर विश्वास नहि होइत छनि । राजा लिखित करार कराए लैत छथि, अन्यथा नओमा दिन ओकरा राजासँ विवाह करए पड़तैक - G. A. Grierson, Maithili Crestomathy and Vocabulary, 1881] गीत राजा सलहेस– ‘तखन राजा भीमसैन कहैत छथीन्ह जे बन्धन खोलाए देबौक, एक एकरार हमरा पास लिखि दह जे आठम दिन चोर माल हाजिर करी, नहिं करी तौं नौम दिन तोहरा सौं विवाह करी, तकर अकरार लिखि दाखिल कर, ओ लिखाए लेल ।
Then said king Bhim Sain, ‘I will have him released, but write a bond in my favour. ‘I will bring the thief and his booty on the eighth day from this. If I do not bring him within that time then,O king, I will marry thee.’Write a bond to that effect.And so he made her to  do’.
 ई शर्त किछु नहि, समाजमे नारीक क्षमताक प्रति अविश्वास एवं बलपूर्वक यौनशोषणक उपक्रम थिक । एही लोकगाथाक चूहड़मलकेँ अनेक रानी छनि जे अन्यो जातिमे प्रचलित बहुविवाहक परिचायक थिक ।
लोक साहित्य रहौक कि शिष्ट साहित्य, लेखक अथवा गाथा गायकक कल्पनाशीलता अवश्य रहैत अछि, मात्रा कम बेसी भए सकैछ । किन्तु सर्वथा निराधार रहैछ से नहि कहि सकैत छी । ओ आधार थिक सामाजिक  जीवनक हृदयक  स्पन्दन । एहि स्पन्दनकेँ R.Gourlay इतिहासक किछु व्यक्तिक शुष्क हड्डीक अपेक्षा समाजक फरिच्छ दर्पण कहल अछि –
R.Gourlay - Forward, The Folk Literature of Bengal - Dr. D.C.Sen, University of Calcutta, 1920. "The attempts to trace the source of the tales have brought to light hidden knowledge. The history of the Indian people in those ancient days is but imperfectly known, but the tales are a mirror of the customs and thoughts of the poeple and , as such are of for greater value to us than the dates and the names of a few individuals - the dry bones of history."
एहि विवृत्तिसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलाक समाजमे स्त्रीक स्थिति सम्मानजनक नहि छल । ओ शोषित आप्रताडि़त छलीह । हुनक बाट कण्टकाकीर्ण छल । ओ डेगडेगपर उपेक्षाक लेल अभिशप्त छलीह । अनेक प्रकारक सामाजिक वर्जना आकुरीतिसँ हुनक जीवनग्रस्त छल ।जतय नारीक पूजा होइत अछि, ततय देवताक वास छनि,एक आकर्षक नारा जकाँ छल ।
उपनिवेश काल : मिथिलामे नारीक स्थिति
स्त्रीशिक्षाक अभाव
मुसलमानी शासनक समाप्तिपर उपनिवेशवादी  शासक द्वारा आरम्भ पाश्चात्य शिक्षाक  प्रसङ्ग अरुन्धती देवीक मन्तव्य अछि
मुसलमानसाम्राज्यभास्कर कौटिल्यावाद  रूप अस्ताचलमे सदाक हेतु लीन भय गेल, समय आयल विदेशी शासकक । एहि समयमे पुरातत्त्वान्वेष्टा सुधारवादी, नेतालोकनि ‘‘स्त्रीशिक्षा’’क घोर आन्दोलन कयल, आनआन देशमे आन्दोलन सफल भेल, पूर्वक जकाँ दुर्द्धर्ष विद्वानक समकक्षामे पाश्चात्य विद्याक विशिष्ट विदुषी उपस्थित भेलीहि । किन्तु मिथिलामे स्त्रीशिक्षाक आन्दोलन युक्तियुक्त नहि बुझल गेल । फल ई भेल जे उन्नैसम शताब्दी मध्य स्त्रीशिक्षामे मिथिला पछुआ गेलि ।
पछुअएबाक कारण छलैक जे यवन आक्रमण एवं आधिपत्यक बाद शिक्षाक क्षेत्रमे मिथिलावासीक दृष्टि आत्मरक्षात्मक भए गेलनि । एकर सबसँ बेसी प्रभाव स्त्रीशिक्षा एवं हुनक सामाजिक सक्रियता पर पड़ल । शिक्षाक अर्थ स्वादिष्ट व्यञ्जन बनाएब, बच्चाक लेल वस्त्र आआङीटोपी सीअब, नेनाभुटकाक लेल उपयोगी औषधिक जनतब राखब भए गेल (मिथिलामोद, उदगार -३७ वर्ष १९१०ई.) । विलियम क्रूक्स   सेहो लिखल अछि जे स्त्रीक लेल शिक्षाक अर्थ भए गेल गृहकार्यमे पटुता अर्जित करब - W. Crooke, The Natives of the British Empire Nothern India, 1907, P. No.183 –
"In the same way, the little girl is trained in household work. She is taught the peculiar knack, not easy to acquire, by which, with a dexterous turn of her wrist, she can sift the grain free of seeds and dirt in the winnowing-fan. She learns the art of milking a cow, and the making of butter and curds, which last forms such a large part of the daily diet; how to boil rice and pulse, how to make a barley or wheaten bannock; how to use the spinning-wheel."
एहिना मिथिला मिहिर, मिथिलांक,दरभंगा, १९३५ई. स्त्रीशिक्षाशीर्षक एक लेखमे कहल गेल अछि जे विश्वविद्यालयसँ डिग्री लए एम्हरओम्हर घूमब स्त्रीशिक्षाक उद्देश्य नहि थिक । बीसम शताब्दीक चारिम दशकधरि अबैतअबैत अधिकांश विचारक स्त्रीशिक्षाक पक्षमे तँ भए गेल छलाह, किन्तु एहि पक्षमे नहि छलाह जे बालक जकाँ कन्यहुकेँ पाठशाला पठाए शिक्षित कएल जाए ।
भारतमे उपनिवेशी शासनव्यवस्था जेनाजेना स्थिर होइत गेल, भारतवासीपर ओ अपन भाषा लादैत गेल । एहि क्रममे 1837 ई. मे कोटकचहरीसँ पहिने फारसी हटाए अङरेजी रखलक । एहि लेल अङरेजी जानकार अमलाक काज पड़लैक । Education Charter (1854) अन्तर्गत अङरेजी माध्यमक स्कूल खोलबा लेल प्रोत्साहित कएल जाए लागल । 1860 मे राजदरभंगा कोर्ट आफ वार्ड्सक अन्तर्गत आबि गेत तँ पूर्णत: मालिक भए गेल । ओ बालके जकाँ बालिकाक हेतु अङरेजी माध्यमक स्कूल खोलेबाक प्रयास कएल । मुदा, तकर घोर विरोध भेलैक । कारण स्पष्ट छल, मिथिलाक छनकल प्रबुद्ध लोक अङरेजक नियति गमि गेल छल एवं शंकाक दृष्टिसँ देखैत छलनि -
Minna G. Cowan, Education of Women of India, P.No. 39, 1912 - "As a rule, the natives look with suspicion on everything which comes from a foreigner, for which reason the great efforts made by the English have not produced corresponding results." 
ओ शंका निराधारो नहि छलैक, किएक तँ अङरेजक नियति स्त्रीशिक्षाक प्रसार नहि, ओहि बाटे अपन धर्मक प्रचारप्रसार छल ।
 Minna G. Cowan, Education of Women of India, 1912, P.N. 243 स्पष्टत: लिखने छथि जे- "It is only thus a part of one great Christian movement that the feminist problems receive its right emphasis and value."
क्रिश्चयन आन्दोलनक सफलताक लेल महिलाक समस्याक समाधान प्राथमिकताक स्तरपर करबाक चाही ।  ओ इहो लिखैत छथि जे भारतीय चर्च प्रबल सामाजिक परिवर्तनक घटक होएत एवं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसँ गैरइसाइपर इसाइयतक प्रभाव बढ़तैक ।( Minna G. Cowan, Education of Women of India, 1912, P. .No.116.)
अङरेजी माध्यमसँ शिक्षाक प्रति मैथिलक धारणाक जनतब सरकारक स्थानीय प्रशासनकेँ छलैक । ओ अपन रिपोर्टमे लिखने छल जे मिथिलाक सामाजिक स्थिति अङरेजी शिक्षाक  अनुकूल नहि अछि आएहि दिशामे सरकारी प्रयासकेँ  सामाजिक क्षेत्रमे हस्तक्षेप बुझल जाएत-
Dr. Jata Shankar Jha, Education in Bihar, Page No. 250 - "The education of female was left entirely to the fostering care of individuals and society. The authorities both here and in England, believed that any direct measure taken in this direction, unless there was a demand for it, would be regarded by the people as interference on the part of Govt. in their social customs."
ओ इहो लिखने छल जे कन्याकेँ शिक्षित करब भाए अथवा पिताक दायित्व थिकैक आविवाहक बाद ई दायित्व पतिक भए जाइत छनि –
Dr. Jata Shankar Jha, Beginnings of Modern Education in Mithila, Page No. xxiii - "As a matter of fact education of males or females was more a private concern in this country. An educated father or brother personally looked after the education of his unmarried daughters or sisters and charge developed on educated husbands after their marriage.”
विद्यावती देवी (श्रीमती विद्यावती देवी, स्त्री शिक्षा, भारती, वर्ष-१, अंक-७, अगस्त-१९३७ ई.) मिथिलामे स्त्रीशिक्षाक स्थितिक मूल्यांकन शिक्षा विभागक वर्ष 1936 ई.क रिपोर्टक आधारपर करैत मत व्यक्त कएल अछि जे दरभंगा, भागलपुर, पूर्णिया जे मैथिली भाषाभाषी प्रान्त कहल जाए सकैछ, तीनियो प्रतिशत बालिका शिक्षा नहि पबैत छथि । ओ मानैत छथि जे ओहि अंकमे दरभंगा, भागलपुर, तथा पूर्णियाक सब जाति सम्मिलित अछि । वास्तविक मैथिलानी तँ बहुत कम्मे होएतीह । ताहूमे 90 प्रतिशत प्राइमरीए कक्षामे होएतीह तथा 10 प्रतिशत मिडिलमे होथि तँ होथि, ताहि सँ उपरक तँ प्राय: चर्चे व्यर्थ । एहूमे एक बात विचारणीय अछि अर्थात् दरभंगा जिला जे मध्य मिथिला कहल जाइछ सबसँ अधिक पछुआएल अछि, ताहिसँ किछु कम भागलपुर, तदुत्तर पूर्णियाक नम्बर अछि । मानू स्त्रीशिक्षा मिथिलाक हेतु खास कए वर्जित अछि । ई पुरुष समाजक स्त्रीशिक्षाक अवहेलनाक फल थिक । ई सरकारी रिपोर्ट अरुन्धतीदेवीक  अभिमतकेँ सेहो पुष्ट करैत अछि ।
उपनिवेशवादी सरकार आओकर शिक्षाव्यवस्थापर मैथिल समाजक शंका भलहि निराधार नहि रहल हो, किन्तु इहो ऐतिहासिक सत्य अछि जे आधुनिक शिक्षामे पछुअएबाक कारण सेहो इएह भेल । जेना अरुन्धती देवी अपन व्यथा व्यक्त कएने छथि ओहिना मैथिलीक अनेकहु लेखिकाक एहि प्रकारक व्यथा अछि । मुदा स्त्रीशिक्षाक प्रति पुरुषवर्गक ई दृष्टिकोण  क्रमश: शिथिल होइत गेल । विशेषत: स्वाधीनताक बाद जखन पारम्परिक सामाजिकपारिवारिक व्यवस्था टूटल, आजीविकाक साधन कम भेलैक एवं शहरापन्न नवयुवककेँ अन्य क्षेत्रक शिक्षित स्त्रीसमाजकेँ देखि ग्लानिक बोध होअए लगलनि ।
पर्दाप्रथा
मिथिलामे पर्दा नहि, लज्जाक महत्त्व सर्वोपरि छलैक । भगवती दुर्गाकेँ हम सब लज्जा रूपेण संस्थिताकहि पूजैतजपैत छी । किन्तु जखन यवन आक्रमण, आधिपत्य, सम्पर्क एवं राजकीयोत्पातक कारण मिथिलामे पर्दाप्रथा अपरिहार्य भए गेलैक तँ तकर सबसँ बेसी प्रभाव स्त्रीसमाजपर पड़ल । अरुन्धती देवी लिखैत छथि – ‘पर्दाप्रथा आओर प्रबल भय गेल, स्त्रीगणकेँ ककरहुसँ भरिमुह बजबौक सौभाग्य अकस्माते प्राप्त होइत छल ।एहिसँ स्त्रीसमाजक सामाजिक सक्रियता कोनटा धरि समटा गेल । बीसम शताब्दीक पहिल दशकमे संयुक्त प्रान्त आबङ्गालमे भारत स्त्री मण्डलक स्थापना भेलैक, 1909 ई. बम्बइमे गुजराती स्त्री मण्डलएवं द सेवासदनअथवा The Sisters Ministrant  क स्थापना भेल । देशकाल एवं ज्ञानविज्ञानक शिक्षाक हेतु ओतय पर्दा लेक्चरक व्यवस्था कएल जाइत छल । बड़ौदाक महारानी देशविदेश भ्रमण कए ओहिठामक स्त्रीसमाजक अध्ययन कएल । किन्तु मिथिलामे विभिन्न पुराणक वाचन द्वारा धार्मिक एवं स्त्री-धर्मक शिक्षा देल जाइत छल । गोपाल कृष्ण गोखलेक कहब मिथिलाक सन्दर्भमे सेहो सत्य अछि जे एहि प्रकारक कथावाचनसँ स्त्रीसमाजमे नवोन्मषक प्रतिभा कम भए गेलैक ।
G. K.Gokhale, Speech at the Education Congress, 1897, " A combination of enforced ignorance and overdone religion have not only made women in India willing victims of customs unjust and hurtful in the highest degree, but it has also made them the most formidable because the most effective opponents of all change or innovation."
मिथिला मिहिर, 7 जुलाइ, 1928 ई.मे प्रकाशित समाचारक अनुसार 22 जून, 1928 ई. केँ मुजफ्फरपुरमे एक स्त्रीसम्मेलन भेल छल । ओहि सम्मेलनमे अनेक प्रस्ताव पारित भेलैक । तीन सएसँ बेसी महिला भाग लेलनि । सम्मेलनक समस्त व्यवस्था महिलालोकनिक  हाथमे छलनि । बी.बी. कालेजक हॉलमे रातिमे शकुन्तला नाटकभेलैक । ओहिमे सभटा महिले कलाकार छलीह । दर्शकमे किछु आमन्त्रित पुरुषलोकनि सेहो छलाह । मिहिरआयोजनक स्वागत कएने अछि । किन्तु मिथिलाक तात्कलिक सामाजिक एवं स्त्रीशिक्षाक स्थिति देखि एहि बातक सम्भावना कमे अछि जे उच्चवर्गक महिलासमाजक सहभागिता रहल होएत । संगठनआयोजनक मार्गमे सबसँ बेसी जे बाधक अछि, से थिक अशिक्षा एवं पर्दाप्रथा । मिथिलामे ई दूनू प्रबल बाधक रहल अछि ।
पर्दा विरोधी आन्दोलन – ‘मिथिलावर्ष -1, अंक-1 , चैत्र (रामनवमी) संवत् 1986क सम्पादकीय टिप्पणीक अनुसार दरभंगा जिलाक पतौर ग्राम निवासी जमिन्दार पं. रामनन्दन मिश्र सावरमती आश्रममे महात्मा गाँधीसँ सपत्नीक भेट कए घुमलाह तँ पर्दाप्रथाक उन्मूलनक हेतु आन्दोलन आरम्भ कएल । महात्मा गाँधीक आदेश पर मगन गान्धीक पुत्री सेहो सङ्ग आएल छलथिन । रामनन्दन मिश्र अपन गामक निकट मझौलियामे मगन आश्रमस्थापित कएलनि । ओहि आश्रममे हुनक पत्नीक अतिरिक्त अन्यो स्त्रीगण रहैत छलीह । गामगाममे पर्दा विरोधी सभा होअए लागल । पर्दाप्रथाक विरोध क्रमश: बढ़ैत गेलैक । आश्रममे चर्खाक शिक्षाक सङ्गहि, पर्दाप्रथाक बहिष्कार कोना कएल जाए, तकरहु व्यावहारिक शिक्षा देल जाइत छलैक । यद्यपि, आधुनिक शिक्षाक विरोधी एवं पर्दाप्रथाक समर्थक द्वारा एहि आन्दोलनक विरोध भेल, तथापि पर्दाप्रथाक विरोधमे मिथिलामे उठल स्वरक मगन आश्रमप्रतीक भए गेल अछि ।
शिक्षाक विकास, सामाजिक स्थितिमे परिवर्तन एवं शहरपलायनसँ जतय पहिने बेटीजमाय अथवा बेटापुतहु परिवारक श्रेष्ठ सदस्यक समक्ष गप्प नहि करैत छलीह, से आब नहि रहल । सिनेमाक प्रभावसँ कट्टर परिवारहुमे रिंग सेरोमनीएवं जयमालहोइत देखल जाइछ । आब किनसाइते कोनो आङनमे सिरकी देखबामे आओत, तथापि ग्रामीण मिथिला विशेषत: तथाकथित उच्चवर्गमे पहिने जकाँ तँ नहि, मुदा पर्दाप्रथाक अवशेष  औखन देखबामे आओत । एहि कारणसँ ने तँ ओ अपन स्वास्थ्यक रक्षा कए पबैत छथि आने सम्पत्तिहिक रक्षामे समर्थ छथि ।
सतीप्रथा
सतीप्रथा कहिआ आकोना आरम्भ भेल तकर जडि़मे जाएब हमर सम्प्रति अभीष्ट नहि, मुदा अठारहम शताब्दीक अन्त होइतहोइत ई विकराल रूप धारण कए हृदय विदारक भए गेल छल, से अवश्य । ई दू प्रकारक छल सहमरण एवं सहजलन । सहमरणक घटना विरल छल । सहजलन सामान्य बात छल । उच्चवर्गमे ई एक धार्मिक प्रथा बनि गेल छलैक । सतीकेँ लोक श्रद्धाक दृष्टिसँ देखैत छल । ओ पूज्य भए जाइत छलीह । सहजलन सदिखन स्वेच्छासँ नहि होइत छलैक । सम्पत्तिलोभ एवं असुरक्षाक भाव सामान्य कारण छल । फ्रांसिस बुकान केँ तिरहुतमे एकहुटा सतीक घटना नहि भेटल छलनि ।( Francis Buchanan- An Account of the District of Purnea,1809-10, P. No 262. ) जखन कि शाहाबादमे सतीक हेतु गामगाममे चबूतरा बनल देखल । परन्तु म.म.परमेश्वर झा (मिथिला तत्वविमर्श) लिखने छथि जे राजा राघव सिंह (1701–1739 ई.)क पत्नी राघवप्रिया सती भेल छलीह । भौरागढ़ीमे (मधुबनी शहरसँ दक्षिण) हुनक चितापर सतीमठ अछि । तिरहुतमे सतीक घटनामे कमीक कारण लोकक सहनशीलता, अल्पहिसँ सन्तोष, लड़ाइभिराइक काजमे विशेष अभिरुचिक अभाव तथा स्त्रीसमाजमे असुरक्षाक कमी रहल होएत ।
एहन अमानुषी प्रथाकेँ रोकबाक कानूनी अधिकार इस्ट इंडिया कम्पनीक सरकारकेँ नहि छलैक । एहि सन्दर्भमे जखन शाहाबादक तत्कालीन जिलाधिकारी एमएचब्रूक  28 जनबरी, 1789क अपन पत्र द्वारा लार्ड कॉर्नवालिससँ आदेश माङ्गल तँ कहल गेलनि जे बूझासूझाकेँ काज कएल जाए -'Confined to dissuation and must not extend to coercive measures or to any exertion of official power. ( Quoted in Dr. K.K.Datta's Selections from Unpublished Correspondences of the Judge, Magistrate and the Judge of Patna (1790 -1857)  - Quoted in Aspect of the History of Modern Bihar, by Dr. Jata Shankar Jha,1988.तथापि, इस्ट इंडिया कम्पनीक पदाधिकारी सतीप्रथाकेँ रोकबाक प्रयास अपना स्तरसँ करैत रहलाह । आजखन लार्ड बेंटिकक समयमे सतीप्रथापर प्रतिबन्ध लागल तँ परम्परावादी सभ, तकर घोर विरोध कएल............ आगाँ पढ़बाक हेुत एतय करीः-http://maithilianushilan.blogspot.in/2014/11/blog-post_55.html