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| डा. शंकरदेवझा |
विद्यापति मैथिल छलाह एहि विवादक निराकरणक आब दीर्घ अवधि व्यतीत भऽ चुकल अछि ।
विद्यापतिक मैथिल परिचिति प्रमाणित करबाक उद्देश्यसँ जुटाओल गेल समस्त प्रमाणक
प्रामाणिकतापर विद्वत समुदाय द्वारा अपन मोहर लगाओल जा चुकल अछि । तथापि एकटा
प्रमाण एहनो अछि जकर ऐतिहासिकता ओ वास्तविकता एखनहुँ धरि सन्दिग्ध बनले अछि । ओ
प्रमाण थिक विद्यापतिक आश्रयदाता ओइनिवारवंशीय नरेश शिवसिंह द्वारा देल गेल बिस्फी
दानक ताम्रपत्र । एहि ताम्रपत्रकेँ ल'क' एखनहुँ धरि भ्रम बनले अछि जे ओ ताम्रपत्र असली थिक वा जाली ?
महाकवि विद्यापति भारतीय साहित्य ओ सांस्कृतिक ओ जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र थिका
जनिका पाबि कऽ के नहि गौरवान्वित होअय चाहत ! विद्यापतिक कोमलकान्त पदावली समस्त
पूर्वाञ्चलमे से धूम मचौलक जे पाँच सय वर्ष धरि ई प्रक्षेत्र विद्यापतिमय बनल रहल
। बंगालीलोकनि विद्यापतिसँ ततबा अभिभूत छलाह जे ओ लोकनि मानि लेने रहथि जे
विद्यापति हुनकेटा छथिन । उनैसम शताब्दीक मध्यमे नवजागरणसँ उद्भूत बंगाल एहि
महापुरुषकेँ अन्तिम रूपसँ बंगाली प्रमाणित करबाक हेतु फाँड़ भीड़िकऽ ठाढ़ भऽ गेल ।
विद्यापतिक बंगाली परिचिति साबित करबाक हेतु बंगालमे एकटा बिस्फी नाम ग्राम सेहो
ताकि लेल गेल । एतबे किएक बंगालमे एकटा शिवसिंह नामक राजा ओ लखिमा नामक रानीकेँ
सेहो गढ़ि कऽ ठाढ़ कऽ देल गेल ।
उनैसम शताब्दीक ओहि मध्यकालमे बंगालमे भाषा जागरण हिलोड़ मारि रहल छल तँ दोसर
दिस मिथिला अपने दिन-दुनियाँमे ओझरायल छल । मैथिल विद्वानलोकनि वैह दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष सन विद्याक गम्भीरतामे डूबल छलाह । समाजक जे
लक्ष्मीपात्रलोकनि छलाह तनिका मामिला-मोकदमासँ फुरसतिये नहि । अपन मिथिला-भाषाक
अस्मिताक रक्षा ओ एकर उत्थानक प्रति मैथिल समाजमे प्रायः चेतनाक भाव नहिये जकाँ छल
। मिथिला विभूति विद्यापतिकेँ छद्म प्रमाणक आधारपर बंगालीलोकनि हथिअयबापर वृत्त
छलाह आ मैथिल लेखेँ धनि सनक स्थिति छल । तथापि भाषा-चेतनाक दृष्टिएँ ओहि
तिमिताछन्नहु कालमे मिथिलामे कमसँ कम एकटा व्यक्तित्व अवश्ये एहन छलाह जनिका
हृदयमे अपन भाषा ओ संस्कृतिक लेल अजस्र चिन्ता छलनि । ओ व्यक्तित्व छलाह दरभंगाक
पिण्डारूच ग्राम निवासी चन्दा झा ( १८३०-१९०७) । विद्वान ओ पंडितसँ भरल मिथिलामे
प्रायः एकमात्र चन्देझा एहन व्यक्तित्व छलाह जे मैथिली भाषा-साहित्यक गौरवशाली
इतिहासक अन्वेषणक संग-संग विद्यापतिक मैथिल परिचितिक प्रमाण सब जुटयबामे
अपस्याँत छलाह । विद्यापतिपर बंगालीलोकनिक दावाकेँ निरस्त करबाक हेतु चन्दाझा हुनकासँ सम्बद्ध जे प्रमाण सभ एकत्र कएलनि से सभ थिक-
अपस्याँत छलाह । विद्यापतिपर बंगालीलोकनिक दावाकेँ निरस्त करबाक हेतु चन्दाझा हुनकासँ सम्बद्ध जे प्रमाण सभ एकत्र कएलनि से सभ थिक-
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| कवीश्वर चन्दाझा |
१. विद्यापति वंशावली-चन्दाझा मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धमे सँ विद्यापतिक सम्पूर्ण
वंशावली ताकि कऽ निकाललनि । बिसइवार-विस्फी मूलक काश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण
वंशक बीजी पुरुष विष्णुठाकुरक सातम पीढ़ी नीचाँ छलाह विद्यापति जनिका सन्दर्भमे
पञ्जीमे कहल गेल अछि- राजपण्डित महामहोपाध्याय विसपी ग्रामोपार्जक कवि, विद्यापतिठाकुर । चन्दाझाक समकालमे विद्यापतिसँ नीचाँ तेरहम
पीढ़ीक हुनक वंशजलोकनि सौराठमे रहि रहल छलथिन ।
२. बिसइवार वंशक आश्रयदाता लोकनिक वंशावली-बिइसवार वंशक आश्रयदाता कर्णाट
राजवंश एवं ओइनिवार राजवंशक प्रामाणिक वंशावलीक अन्वेषण कएलनि ।
३. बिसइवार, कर्णाट
ओ ओइनिवार वंशसँ सम्बद्ध अनेकानेक स्थान, ओहि स्थानपर अवशिष्ट पुरातत्व, अभिलेख, किंवदन्ती, मिथ आदिक संकलनि कएलनि ।
४. विद्यापतिक रचना संकलन- चन्दाझा विभिन्न स्रोत सभसँ विद्यापतिक पदावलीक
संकलन कएलनि । तरौनीमे तालपत्रपर लिखित विद्यापतिक पदावलीक अन्वेषण हुनकहि द्वारा
कएल गेल । एही क्रममे चन्दाझाकेँ तरौनी ग्रामनिवासी पं. लोकेश्वर झाक घरमे
विद्यापतिक स्वहस्तलेखमे तिरहुतामे तालपत्रपर तीन खण्डमे लिखित भागवत पुस्तक
देखबामे अयलनि । एहि पुस्तकक अन्तमे लिखल छल-'...शुभमस्तु सर्वार्थगता ल.सं.२९९ श्रावण सुदि १५
कुजे॒रजा-बनौली ग्रामे विद्यापतेलिपिरियमिति ।' एहि ग्रन्थक संग चन्दाझाकेँ विद्यापति लिखित राजनीति एवं
लोक प्रशासन विषयक ग्रन्थ लिखनावलीक तालपत्र सेहो देखबामे अयलनि । एहि दुनू
ग्रन्थक लेखन विद्यापति अपन रजा-बनौली निवासक क्रममे कएने छलाह । चन्दाझा
विद्यापतिसँ सातम पीढ़ी अयनिहार हुनक एकटा वंशज नारायण ठाकुर द्वारा कएल गेल
विद्यापति रचित पुरुष परीक्षाक प्रतिलिपिक सेहो अन्वेषण कएलनि । जकर अन्तमे लिखल
छल-
वेद पञ्चाशेत गौड़े माघे च प्रथमे तिथौ ।
नारायणेन लिखिता पुस्ती विद्यापतेः कवेः ।। ल. सं. ५०४.
चन्दाझाकेँ विद्यापति रचित शैवसर्वस्वसारक पाण्डुलिपि तऽ भेटबे कएलनि संगहि
विद्यापतिक प्रसिद्ध अवहट्ट काव्य ग्रन्थ कीर्तिलताक प्रति सेहो भेटलनि । एकर
अतिरिक्त विद्यापति द्वारा अवहट्टेमे रचित कोनहुँ और ग्रन्थक एकटा अंश प्राप्त
भेलनि जाहिमे देवसिंहक मृत्यु ओ शिवसिंहक राज्यारोहणक वर्णन अछि । ई अंश
कीर्तिपताकाक थिक वा विद्यापति रचित एहिसँ पृथक कोनो तेसर अवहट्ट ग्रन्थक से तथ्य
एखन धरि अनिर्णित अछि ।
५. विद्यापति-अनुसन्धनक एहि अभियानमे चन्दाझाकेँ एकटा और जे महत्वपू्र्ण
अभिलेख प्राप्त भेलनि से छल राजा शिवसिंह द्वारा विद्यापतिकेँ देल गेल बिस्फी
ताम्रपत्र । पञ्जीमे विद्यापतिक संग जे 'विसपी ग्रामोपार्जक' टिप्पणी अछि, तकरा प्रमाणित करैत अछि ई बिस्फी दानपत्र । एहि
ताम्रपत्रकेँ देखबाक एकटा संयोग चन्दाझाकेँ लागि गेलनि । १८५० इ.मे बिस्फी
ब्रह्मोत्तर एकटा कानून विवाद ठाढ़ भेल । ताहि क्रममे विद्यापतिक वंशज भैया ठाकुर
साक्ष्यक रूपमे न्यायालयक समक्ष ओहि ताम्रपत्रकेँ प्रस्तुत कएलनि । पश्चात एहि
ताम्रपत्रकेँ सुरक्षित रखबाक हेतु चन्दाझाक एकटा ग्रामीण शिवलाल चौधरी जे
पिण्डारूचक प्रभावशाली जमीन्दार ओ भैया ठाकुरक भगिना छलाह तनिका जिम्मा दऽ देल
गेलनि । एहि क्रममे चन्दाझाकेँ ओहि ताम्रपत्रकेँ देखबाक अवसर प्राप्त भेलनि जकर ओ
प्रतिलिपि तैयार कऽ लेलनि ।
एहि प्रकारेँ चन्दाझा विद्यापतिक मैथिल परिचितिसँ सम्बद्ध प्रचूर साक्ष्य सब
जुटा तऽ लेलनि, मुदा
एहि सभ सामग्रीकेँ विद्वत समुदायक समक्ष प्रस्तुत कऽ सकितथि से कोनो साधन हुनका
लगेमे नहि छलनि । ओहि समयमे मिथिलामे कोनो प्रेस नहि छल जतयसँ एहि सभ सामग्रीकेँ
प्रकाशित सकितथि । अपना एतेक सामर्थ्य नहि छलनि जे कलकत्ता वा कोनो अन्य नगर स्थित
प्रेससँ छपा सकितथि । मैथिलीमे बंगला सदृश कोनो पत्रिकाक प्रकाशनक दूर-दूरधरि कोनो
सम्भावना नहि छल आ ने मैथिलीक नामपर कोनो साहित्यिक संस्था वा मंचे छल जाहि
माध्यमसँ ई अपन गप्प कहि सकितथि । दरभंगा राज दिससँ जँ किछुओ सहायताक आशा करितथि
तऽ सेहो सम्भव नहि छल किएक तँ १८६० मे तत्कालीन दरभंगा नरेश महेश्वरसिंहक मृत्युक
बाद राज कोर्ट्स ऑफ वार्ड्सक अधीन भऽ गेल छल । तेहना स्थितिमे चन्दाझाकेँ मोन
मसोसि कऽ रहि जयबाक अतिरिक्ति दोसर कोनोटा उपाय नहि रहि गेल छलनि ।
चन्दाझा यद्यपि विद्यापतिसँ सम्बद्ध संचित सामग्रीकेँ समयपर प्रकाशित नहि करा
सकलाह,
तथापि हिनक ई अनुसन्धन कार्य सब नुकायल नहि रहि सकलनि ।
कतिपय बंगाली ओ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन प्रभृति अंग्रेज विद्वान लोकनि चन्दाझा
द्वारा संगृहित सामग्रीक अवलोकन ओ उपयोग करैत रहलाह । चन्दाझाहिक साक्ष्यक गम्भीर
अध्ययन कएलाक पश्चात बंगाली विद्वान रामकृष्ण मुखोपाध्याय एहि निष्कर्ष पर
पहुँचलाह जे विद्यापति बंगाली नहि मैथिल छलाह । 'बंगदर्शन'मे १८७५ मे जखन हुनक एतद् विषयक निबन्ध प्रकाशित भेल तँ बंगालमे हंगामा मचि
गेल । ओही वर्ष इण्डियन एण्टीक्वेरीमे जॉन बीम्सक एकटा आलेख प्रकाशित भेलनि जाहिमे
ओ सप्रमाण कहलनि जे विद्यापित पदक भाषा बंगला नहि थिकनि । एकटा दरभंगा आवासी
बंगाली विद्वान शारदाचरण मित्र चन्दाझाहिक संकलनक उपयोग करैत बंगलामे १८७८-७९५मे
विद्यापति पदावलीक प्रकाशन कएलनि । एहि पदावलीक भूमिका नगेन्द्रनाथगुप्तक लिखल
थिकनि जाहिमे ओ विद्यापतिकेँ मैथिल होयब स्वीकार कएलनि । पुनः १८८२मे एसियाटिक
सोसाइटीक जर्नलमे ग्रियर्सन विद्यापतिक बेरासी गोट मूल पद ओ ओकर अंग्रेजी अनुवाद
प्रकाशित करौलनि ।
एहि प्रकारेँ विद्यापतिक परिचितिकेँ लऽ कऽ व्याप्त भ्रमक निवारण तँ भऽ गेल, मुदा तकर कोनोटा श्रेय चन्दाझाकेँ नहि भेटि सकलनि । हुनका
द्वारा संचित सामग्रीक उपयोग सामर्थ्यवान विद्वान लोकनि करैत रहलाह । चन्दाझा अपना
द्वारा संचित एहि विपुल सामग्रीक मात्र एकटा छोट अंशक उपयोग कऽ सकलाह, पुरुष परीक्षाक मूल एवं ओकर मैथिली अनुवादक माध्यमसँ । सेहो
ई तखने सम्भव भऽ सकल जखन १८७९ मे दरभंगा राज कोर्ट्स ऑफ वार्ड्स सँ मुक्त भऽ सकल आ
लक्ष्मीश्वर सिंह शासन सम्हारलनि । हिनका शासनकालमे दरभंगामे पहिल-पहिल बेर रास
दिस सँ अपन प्रेस 'राज
दरभंगा यन्त्रालय' नामसँ बैसाओल गेल । मुदा मैथिलीक संग दुर्भाग्य पछोड़ धयनहिँ अयलनि । नवीन
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह हिन्दीक ततबा पक्षधर भऽ गेल छलाह जे अपन राज-काजक भाषाक
स्थानपरसँ मैथिलीकेँ हटाकऽ हिन्दीकेँ स्थापित कऽ देलनि एवं तिरहुताक स्थानपर
देवनागरी थोपि देल गेल ।एहना स्थितिमे दरभंगा राजक दृष्टिमे मैथिली भाषा ओ विद्यापति
सन विभूतिक कोनो प्रासंगिकता नहि रहि गेल । तथापि जेना-तेना चन्दाझा विद्यापतिक
पुरुष परीक्षा ओ ओकर स्वीकृत मैथिली अनुवादक प्रकाशन देवनागरी लिपिमे करा सकलाह ।
१८८८इ.मे राजदरभंगा यन्त्रालयसँ मुद्रित पुरुष परीक्षाक भूमिका, दरभंगा राजक नीतिक अनुरूपेँ चन्दाझाकेँ हिन्दीमे लिखऽ
पड़लनि । मैथिली प्रति दरभंगा राजक उपेक्षापूर्ण नीतिकेँ देखैत चन्दाझा पोथीक
अन्तमे विद्यापति-सम्बन्धी अपन अधिकांश अनुसन्धनकेँ हिन्दीक माध्यमसँ संक्षिप्त
रूपमे प्रस्तुत कऽ देलनि । यद्यपि पुरुष परीक्षाक भूमिकामे ई कहल गेल अछि जे शीघ्रहिँ
विद्यापतिक पदावली सेहो प्रकाशित कएल जायत । मुदा चन्दाझाक ई इच्छा ने हुनक जीवैत
आ ने हुनक मृत्युक बादे आइ धरि पूरा भऽ सकलनि । हुनका द्वारा संकलित विद्यापतिक
पदक उपयोग वा दुरुपयोग कोन प्रकारेँ नगेन्द्रनाथ गुप्त कएलनि सेहो एकटा फराके
विचारक विषय भऽ सकैत अछि । रमेश्वर सिंहक सिंहासनारोहणक पश्चात नगेन्द्रनाथगुप्त
जखन विद्यापति पदावलीक टोहमे दरभंगा पहुँचलाह तँ महाराजक आदेशपर चन्दाकेँ अपन
समस्त संग्रह हुनका सुपुर्द कऽ देबऽ पड़लनि । गुप्तकेँ एहि संग्रहमे चन्दाझा
द्वारा कएल तरौनी पदावलीक प्रतिलिपि सेहो भेटलनि ।तखन हुनक इच्छा भेलनि जे ओ तरौनी
पदावलीक मूल पाण्डुलिपि सेहो देखथि । रमेश्वर सिंह द्वारा सेहो उपलब्ध करा देल
गेलनि । पश्चात् नगेन्द्रनाथ तरौनी पाण्डुलिपिकेँ हेरा जयबाक गप्प कहलनि । एहि
प्रकारेँ विद्यापतिक तरौनी पदावली ओ ओकर चन्दाझा कृति पाण्डुलिपि दुनू सदा-सर्वदाक
लेल निपत्ता भऽ गेल । जखन चन्दाझाक मृत्यु भऽ गेलनि तकर बाद १९०९मे बंगलामे
नगेन्द्रनाथगुप्त सम्पादित विद्यापति पदावली प्रकाशित भेल ।
वास्तवमे चन्दाझाकेँ अपन विद्यापति सम्बन्धी अनुसन्धनक भविष्यक अनुमान भऽ गेल
छलनि । तेँ ओ पुरुष परीक्षामे जतेक सम्भव भऽ सकलनि ततेक सूचना अंकित कऽ देलनि ।
एहि क्रममे बिस्फी ताम्रपत्रक जे ओ प्रतिलिपि कएने छलाह तकर अविकल पाठ अपन एहि
पोथीक परिशिष्ट भागमे दऽ देलनि जे निम्न रूपक अछि:-
स्वस्ति । गजरथत्यादि समस्तप्रक्रिया विराजमान
श्रीमद्रामेश्वरीवर-लब्धप्रसादभवानीभवभक्तिभावन परायण-रूपनारायण-महाराजाधिराज-श्रीमच्छिवसिंहदेवपादाः
समरविजयिनः जरइलतप्पयां विसपीग्राम-वास्तव्यसकललोकान् भूकर्षकाँश्च
समादिशन्ति-मतमस्तु भवतां ग्रामोऽयमस्माभिः सप्रक्रियाभिनवजयदेव
महाराजपण्डितठक्कुर-श्रीविद्यापतिभ्यः शासनीकृत्य प्रदत्तोऽतो यूयमेतेषां
वचनकरीभूय कर्षणादिकं करिष्यथेति ल.सं.२९३ श्रावणशुदि-सप्तम्यां गुरौ ।
श्लोकास्तु
अब्दे लक्ष्मणसेनभूपतिमते वह्निग्रहद्वयङ्किते,
मासि श्रावनसंज्ञके मुनितिथौ पक्षेऽवलक्षे गुरौ ।
वाग्वत्याः सरितसृते गजरथेत्याख्याप्रसिद्धे पुरे
दित्सोत्साह विवृद्धबाहुपुलकः सभ्याय मध्येसभम् ।।१।।
प्रज्ञावान् प्रचुरोर्वरं पृथुतराभोगं नदीमातृकं,
सारण्यं ससरोवरं च विसपीनामानमासीमतः ।
श्रीविद्यापतिशर्मणे सुकवये वाणीरसास्वादविद्
वीरः श्रीशिवसिंहदेवनृपतिर्ग्रामं ददे शासनम् ।।२।।
येन साहसमयेन शस्त्रिणा, तुङ्गवाहवरपृष्ठवर्त्तिना
अश्वपत्तिबलयोर्बलं जितं, गज्जनाधिपति-गौडभूभुजाम् ।।३।।
रौप्यकुम्भ इव कज्जलरेखा, श्वेतपद्म इव शैवलवल्ली ।
यस्य कीर्त्तिनवकेतककान्त्या, म्लानिमेति विजितो हरिणाङ्क ।।४।।
द्विषन्नृपतिवाहिनी रुधिरवाहिनीकोटिभिः
प्रतापतरुवृद्धये समरवेदिनी प्लाविता ।
समस्तहरिदङ्गनाचिकुरपाशवासः क्षमं
सितप्रसवपाण्डरं जगतियेन लब्धं यशः ।।५।।
मतङ्गजरथप्रदः कनकदानकल्पद्रुम-
स्तुलापुरुषमद्भुतं निजधनैः पिता दापितः ।
अखानि च महात्मना जगति येन भूमिभुजा
परापरपयोनिधि प्रथममैत्रपात्रं सरः ।।६।।
नरपतिकुलमान्यः कर्णशिक्षावदान्यः,
परिचितपरमार्थो दानतुष्टार्थिसार्थः ।
निजचरित पवित्रो देवसिंहस्य पुत्रः,
स जयति शिवसिंहो वैरिनागेन्द्रसिंहः ।।७।।
ग्रामे गृह्णन्त्यमुष्मिन् किमपि नृपतयो हिन्दवोऽन्ये
तुरुष्का
गोकोलस्वात्ममांसैः सहितमनुदिनं भुञ्जते ते स्वधर्मम् ।
ये चैनं ग्रामरत्नं नृपकररहितं पालयन्ति प्रतापै-
स्तेषां सत्कीर्त्तिगाथा दिशि दिशि सुचिरं गीयतां
वन्दिवृन्दैः ।।८।।
चन्दाझा द्वारा अन्वेषित विद्यापतिक एकगोट अवहट्ट पद्यखण्डक अनुसार लक्ष्मण
संवत २९३,
शाके १३२४, चैत्र कृष्ण षष्ठी, बृहस्पति दिन देवसिंहक मृत्यु भेलनि आ शिवसिंह तिरहुतक
उत्तराधिकारी भेलाह । ओहि समयमे तिरहुत गौड़ ओ गज्जनक संयुक्त आक्रमणसँ जूझि रहल
छल । मुदा, अन्ततः
शिवसिंह विजयी रहलाह । एहि घटनाक चारि मासक पश्चात शिवसिंह अपन बालसखा
विद्यापतिकेँ ल.सं.-२९३, स्रावण शुक्ल सप्तमी, गुरुवार केँ अपनी नवीन राजधनी गजरथपुरसँ बिस्फी दानपत्र प्रदान कएलनि । ई
बिस्फी विद्यापतिक मूलग्राम एवं निवासग्राम दुनू छलनि । बिस्फीक विशालताक सम्बन्ध
मे मिथिला मे आइयो एकटा कहबी प्रचलित अछि-बीसा सय हर बिस्फी बहय, तैयो बिस्फी पड़ले रहय ।'
बिस्फी दानपत्र विद्यापतिक मैथिल परिचितिक एकगोट अकाट्य ऐतिहासिक साक्ष्य छल
जे बंगालीलोकनि मुँह बन्द कऽ देलकनि । बंगाली विद्वान रामकृष्ण मुखोपाध्याय तँ एहि
ताम्रपत्रक सत्यताक परीक्षण करबाक हेतु सौराठ स्थित विद्यापतिक वंशजलोकनि धरि
पहुँचि गेल रहथि आ सब दृष्टिएँ सन्तुष्ट भेलाक बादे विद्यापतिकेँ मैथिल मानबा लेल
तैयार भेलाह ।
१८८८ इ. मे पुरुष परीक्षामे बिस्फी ताम्रपत्रक अविकल पाठ प्रकाशित भेलाक बाद
पुनः विद्वानलोकनि एकर परीक्षणमे जुटलाह । जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपन अनुसन्धनक
बाद १८९९मे एसियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगालक प्रोसिडिंग्स (भाग-६७, खण्ड-१, पृ-९६)मे बिस्फी ताम्रपत्रकेँ अप्रामाणिक कहलनि । ग्रियर्सन
द्वारा एकरा अप्रमाणिक कहबाक पाछाँ हुनक दू गोट आधार छल-
१. बिस्फी ताम्रपत्र देवनागरी लिपिमे अछि । जाहि समयक ई ताम्रपत्र थिक ताहि
समयमे मिथिलामे मिथिलाक्षरक व्यवहार होइत छल ।
२. ताम्रपत्रक अन्तमे तीन गोट अतिरिक्त सन् अछि, हिजरी सन् ८०७, संवत् १४५५, एवं शाके १३२१ । एहिमे हिजरी सनक प्रयोग अकबरक समयसँ
प्रारम्भ भेल । जखन कि ई ताम्रपत्र अकबरसँ बहुत पूर्वक थिक ।
ग्रियर्सन द्वारा बिस्फी ताम्रपत्रपर ठाढ़ कएल गेल एहि प्रश्नक बाद बंगीय
साहित्य परिषद् पत्रिका, बंगाब्द १३०७ (१९०१ इ.) सेहो एकरा जाली मानि लेलक । यद्यपि डॉ. हरप्रसाद
शास्त्री अपना द्वारा सम्पादित कीर्तिलता (१९२४) क भूमिकामे एवं डा. दिनेशचन्द्र
सेन अपन बंगभाषा ओ साहित्यमे अपन अुनमानक आधारपर ई तर्क देलनि जे सम्भवतः अकबरक
शासनकालमे एहि दानपत्रक नकल तैयार करबाओल गेल होयत, तेँ एहिमे अकबर द्वारा प्रचारित सन उत्कीर्ण अछि ।
वास्तवमे ग्रियर्सन जे सन्देह ठाढ़ कएलनि तकर निवारण आइ धरि नहि भऽ सकल अछि । १९३४
मे विद्यापति-अनुसंधनक दिशामे चन्दाझाक बाद जे दोसर विद्वान अग्रसर भेलाह, से छलाह शिवनन्दन ठाकुर । १९४१मे हिनक हिन्दी ग्रन्थ 'महाकवि विद्यापति' प्रकाशित भेलनि । मुदा स्व. ठाकुर सेहो मिथिलामे देवनागरी लिपिक
प्रचार एवं एक सँ अधिक सन्'क प्रयोगक
प्रचलन होयबाक तर्क दैत किछु विशेष नहि कहि सकलाह ।
एहि सन्दर्भमे एतेक तँ निश्चित रूपसँ कहल जा सकैत अछि जे मिथिलामे देवनागरी केर
प्रयोग उनैसम शताब्दीमे आबि कऽ होअय लागल । तेहना स्थिति से ई कहब जे शिवसिंहक समयमे
मिथिलामे देवनागरी केर प्रचार छल, सरासर कुतर्क होयत । मुदा ताहूसँ बढ़िकऽ प्रश्न ई अछि जे जँ
बिस्फी ताम्रपत्र जे चन्दाझा देखने छलाह से देवनागरीमे रहितय तँ ई बात अवश्ये ओ लिखने
रहितथि । दोसर प्रश्न ई जे जँ ताम्रपत्रक अन्तमे ई तीन गोट अतिरिक्त सन् रहितय तँ चन्दाझा
द्वारा कएल गेल प्रतिलिपिमे सेहो ओ रहितय । जँ चन्दाझाक प्रतिलिपिमे ई तीन गोट अतिरिक्त
सन् नहि अछि तँ ग्रियर्सनकेँ ई कतऽ सँ भेटि गेलनि ? ने तँ चन्दाझाहिक अनुसन्धान
क्षमतापर सन्देह कएल जा सकैत अछि आ ने ग्रियर्सनक टिप्पीयेपर अविश्वास । तँ की ई मानल
जाय जे ग्रियर्सन चन्दाझासँ भिन्न बिस्फी ताम्रपत्रक कोनो दोसर प्रति देखने होयताह, जाहि आधारपर ओ अपन मन्तव्य देने छल होयताह ?
इतिहासक एहि ओझरायल गीरहकेँ सोझरायबाक हेतु एकबेर फेर पाछाँ घुमबाक प्रयोजन अछि
। चन्दाझा पुरुष परीक्षाक अनुवाद पोथीमे उक्त मोकदमाक संक्षेपमे किछु विवरण देने छथि
। तदनुसार १२५७ साल (१८५० इ.)मे जखन कंपनी सरकार बिस्फी ब्रह्मोत्तर जप्त कऽ लेलक तँ
विद्यापति वंशज भैयाठाकुर लोकनि कोर्टक शरणमे गेलाह । ओतऽ उक्त ताम्रपत्र ओ वंशावली
प्रस्तुत कएलनि । ताम्रपत्रक 'तरजुमा' कऽ कऽ हाकिमकेँ
देखाओल गेल ओ सनद मे देल गेल शपथक 'तरजुमा' कऽ कऽ सुनाओल गेल जे-अकर बिस्फीसँ जँ केओ कर असूल करय तँ हिन्दू
केँ गो-मांस एवं मुसलमानकेँ सुगरक मांस खयबाक फल भेटैक । एहिपर अँग्रेज हाकिम बाजल
जे ओकरा हेतु दुनू पशुक मांस भक्ष्य छैक तेँ ओ सब एहि शपथसँ मुक्त अछि ।
चन्दाझाक उपर्युक्त विवरणसँ दूटा तथ्य बहराइत अछि । ओ 'तरजुमा' शब्दक दू बेर प्रयोग दू भिन्न अर्थमे कएलनि अछि । प्रथम ताम्रपत्रक
'तरजुमा'क तात्पर्य ओकर लिप्यन्तरणसँ अछि आ दोसर बेर तरजुमाक प्रयोग ओकर भाषान्तरणसँ अछि
। अर्थात् ताम्रपत्रमे जे विषय संस्कृत मे कहल गेल अछि तकरा तत्कालीन अदालतक भाषामे
अदालत पण्डित विद्याकर मिश्र अनुवाद कऽकऽ हाकिमकेँ सुनौलथिन । एहनामे अनुमान कएल जा
सकैत अछि जे बिस्फी ताम्रपत्रक नकल तैयार कएल गेल होयत जकरा ग्रियर्सन देखने होयताह
। मूल ताम्रपत्र जे पिण्डारुचक शिवलाल चौधरीक घरमे राखल गेल छलनि तकरा देखबाक अवसर
हुनका नहि भेटि सकलनि ।
आब बिस्फी ताम्रपत्रक ई दोसर लिप्यन्तरित प्रति समस्या बनि कऽ ठाढ़ होइत अछि ।
ग्रियर्सन सरकारी अधिकारी छलाह आ ओ विस्फी ताम्रपत्रक देवनागरी पाठबला प्रति देखने
छलाह तँ एकरा सरकारी अभिलेखागारमे कतहु ने कतहु होयबाक चाही । दरभंगा समाहरणालय अभिलेखागारमे
एहि सन्दर्भमे छान-बीन कएलापर सूचना भेटल जे अवश्य एतऽ एकटा ताम्रपत्र छल जकरा १९७४-७५मे
चन्द्रधारी संग्रहालयकेँ दऽ देल गेल । पुनः चन्द्रधारी संग्रहालयमे पुछा-आछी कएलापर
आशानुरूप उत्तर भेटल जे सेफमे विद्यापतिक बिस्फी ताम्रपत्र छनि । अथक प्रयासक बाद तामत्रपत्रकेँ
देखबाक अवसर भेटल । एकर लम्बाई-३९.५ से.मी., चौड़ाई-२४.५ से.मी., मोटाई-०.२ से.मी. एवं ओजन-१७२० ग्राम ।ताम्रपत्र नीचाँ सँ थोड़ेक
फाटल अछि । किछु उपचार ओ प्रयोग कयलाक बाद एहि ताम्रपत्रपर उत्कीर्ण अभिलेखकेँ पढ़ब
एवं एकर छवि कैमरासँ लेल जायब सम्भव भऽ सकल ।
निश्चित रूपेँ ई वैह ताम्रपत्र थिक जे विद्यापतिक वंशज लोकनि 'तरजुमा' करा कऽ सरकारकेँ देने छलथिन एवं ग्रियर्सन एकरा देखने छलाह ।
ताम्रपत्र मे ऊपरमे बामा दिस गरुड़क चित्र उत्कीर्ण अछि । एकर भाषा संस्कृत मुदा लिपि
कैथी प्रभावित देवनागरी अछि । ताम्रपत्रक सबसँ उपरमे "श्रीराम" उत्कीर्ण
अछि । मूल अभिलेख बिना पदच्छेदक चौबीस पाँतीमे उत्कीर्ण अछि । अन्तिम पाँतीमे ग्रियर्सनक
कथनानुसार अवश्ये तीन गोट अतिरिक्त सन् अछि । ताम्रपत्रक सबसँ नीचाँमे 'शुभमस्तु श्रीरस्तु' उत्कीर्ण अछि । लगैत अछि जे ग्रियर्सन एकरा उपरे-झापर देखि कऽ
अप्रामाणिक कहि देलनि । जँ ओ गम्भीरतापुर्वक चन्दाझाक देल पाठसँ एहि लिप्यन्तरणबला
ताम्रपत्रक पाठक तुलना करितथि तँ हुनका आरो अन्तर सब देखबामे अबितनि । चन्दाझाक पाठमे
ताम्रपत्रक प्रारम्भ मिथिलाक परम्पराक अनुरूप 'स्वस्ति'सँ भेल अछि । मुदा एहि दोसर ताम्रपत्रक प्रारम्भ "श्री गौरीशंकराभ्यां नमः
।।सिद्धि।।"सँ भेल अछि । एकर अतिरिक्तो एहिमे बहुत रास अन्तर ओ अशुद्धि सब अछि
।
एहि आधारपर ताम्रपत्रक एहि द्वैतीयक प्रतिकेँ अप्रामाणिक कहल जा सकैत अछि । मुदा
आश्चर्य लगैत अछि जे ग्रियर्सन सन प्रशासक-अनुसन्धाता कोन एकरा अप्रामाणिक कहि देलनि
। बिस्फी ब्रह्मोत्तरक विवादसँ ग्रियर्सन अवगत नहि छल होयताह से नहि मानल जा सकैत अछि । पुनः एहि द्वैतीयक प्रतिक
खोज करबाक क्रममे हुनका बिस्फी-विवादसँ सम्बद्ध समस्त न्यायिक कागज-पत्र देखबाक अवसर
भेटले होयतनि तकर बादो ओ वास्तविक तथ्यक उद्घाटन करबाक स्थानपर एतेक पैघ ऐतिहासिक भ्रम
ठाढ़ कऽ देलनि तकर किछु औचित्य नहि बुझा पड़ैत अछि । की एहिकेर पाछाँ हुनक उद्देश्य
चन्दाझाक अनुसन्धन-कार्यकेँ मिथ्या साबित करब तँ नहि छलनि ?
वास्तवमे ताम्रपत्रक ई द्वैतीयक प्रति मूल प्रतिक 'सत्य प्रतिलिपि (True Copy)' थिक । अंग्रेज जज ओ ओकर अमैथिल पेशकारकेँ ताम्रपत्रक विषय-वस्तु
बुझयबाक हेतु मिथिलाक्षरसँ देवनागरीमे लिप्यान्तरित करबाओल गेल । जाहिम समयक ई घटना
थिक ताहि समयमे मिथिलामे लक्ष्मण संवत् सर्वथा अप्रचलित भऽ छल । अतः एहि संवत्'क वास्तविक समयक अभिज्ञान करयबाक हेतु सभकालमे प्रचलित तीनटा
सन केँ सेहो फराक सँ उत्कीर्ण करा देल गेल । एहि द्वैतीयक प्रतिक निर्माण सेहो मिथिलासँ
बाहर प्रायः वाराणसी मे कराओल गेल, तेँ ओहि ठामक कारीगर 'श्रीराम' वा अन्य स्थानीय परम्पराक तत्वसभ एहिमे जोड़ि देलक ।
बिस्फी ताम्रपत्रक जे मूलप्रति पिण्डारूचमे छल ताहि दिससँ भावी अनुसन्धता लोकनिक
ध्यान नहि जानि तकर पूरा प्रयास ग्रियर्सन कएलनि, जाहिमे ओ सफलो रहलाह । पश्चात् कालमे जे केओ विद्वान विद्यापति
अनुसन्धनक दिशामे अग्रसर भेलाह से ग्रियर्सनक द्वारा पसारल गेल भ्रमक शिकार होइत रहलाह
। यद्यपि शिवनन्दन ठाकुर सन मैथिल विद्वान चन्दाझाक स्रोतक दिशामे बढ़लाह आ हुनका विशलाल
चौधरीक वंशज रतिकान्त चौधरी एडवोकेट (पश्चात् पटना उच्च न्यायालयक न्यायमूर्ति) सँ
बिस्फी ताम्रपत्रक ओ मूलप्रति हस्तगतो भेलनि । मुदा स्व. ठाकुर ओकर उपयोग नहि कऽ सकलाह
। जँ ओ ताम्रपत्रकेँ थोड़ेक प्रयत्न कऽ कऽ पढ़ि लेने रहितथि तँ हुनका समक्ष पूरा चित्र
स्पष्ट भऽ गेल रहितनि । मुदा ओहो ग्रियर्सन द्वारा पसारल गेल भ्रमजालेमे ओजरायल रहि
गेलाह । अपन पोथीमे चन्दाझा द्वारा देल गेल ताम्रपत्रक पाठकेँ उतारि ओकर अन्तमे ग्रियर्सनक
कथनानुसार तीनटा सन जोड़ि देलनि । एहि प्रकारेँ स्व. ठाकुर ऐतिहासिक भ्रान्तिक निराकरणक
एकटा स्वर्णिम अवसर गमा देलनि । फलतः बिस्फी ताम्रपत्रक प्रामाणिकता आइयो सन्देहास्पद
बनले अछि ।
बिस्फी ताम्रपत्रक सत्य प्रतिलिपि तँ चन्द्रधारी संग्रहालय, दरभंगामे सुरक्षित अछि । मुदा एकर मूल प्रति वर्तमानमे कतऽ अछि
से केओ कहनाहर नहि अछि । एमहर कोनो सूत्रसँ ज्ञात भेल जे स्व. रतिकान्त चौधरी ओ ताम्रपत्र
स्व. गोविन्द चौधरी अधिवक्ताकेँ सुरक्षित रकबाक हेतु देलथिन । स्व. गोविन्दबाबूक पुत्र
डॉ. श्रीश चौधरीसँ जखन एहि प्रसंग जिज्ञासा कएल गेल तँ ओ एहि विषयकेँ गम्भीरतासँ नहि
लेलनि । एहना स्थितिमे पिण्डारूचक स्व. शिवलाल चौधरीक वंशज लोकनि सँ यैह प्रार्थना
कएल जा सकैत छनि जे ओ लोकनि जँ एहि दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्रीकेँ बाहर निकालि सकथि तँ
समाजक लेल ई बड़ पैघ उपकार होयत आ मिथिलाक इतिहासक एकटा गौरवमय पृ्ष्ठक सन्दिग्धताक
निराकरण भऽ सकत ।
(साभारः-'घर-बाहर', अक्टूबर-दिसम्बर, २०१३ अंक)
टिप्पणीः-'घर-बाहर'मे एहि लेखक प्रकाशनक उपरान्त हमरा स्व. रतिकान्त चौधरीक पुत्र श्री रूक्मीणिकान्त चौधरी (सेवानिवृत न्यायधीश) फोनकऽ सूचना देलनि जे प्रायः १९७२-७३ ई.मे चन्द्रधारी संग्रहालयक तत्कालीन क्यूरेटर हुनकासँ कोनो आन सम्बन्धमे सम्पर्क कयने छलथिन । एही क्रममे श्री मुक्तिकान्त बाबू हुनका ओ ताम्रपत्र सेहो देखबाक हेतु देलथिन । ताम्रपत्र कारी भऽ गेल छलैक आ ओहिपर उत्कीर्ण पाठ अपठनीय भऽ गेल छल । उक्त क्यूरेटर महाशय ओ ताम्रपत्र हिनकासँ पढ़बाक हेतु लेने छलथिन मुदा, तकर पश्चात ओ ताम्रपत्र कतय गेल, कतय राखल अछि, आइधरि एहि विषयमे कोनो जनतब नहि उपलब्ध भऽ सकल अछि ।-लेखक
टिप्पणीः-'घर-बाहर'मे एहि लेखक प्रकाशनक उपरान्त हमरा स्व. रतिकान्त चौधरीक पुत्र श्री रूक्मीणिकान्त चौधरी (सेवानिवृत न्यायधीश) फोनकऽ सूचना देलनि जे प्रायः १९७२-७३ ई.मे चन्द्रधारी संग्रहालयक तत्कालीन क्यूरेटर हुनकासँ कोनो आन सम्बन्धमे सम्पर्क कयने छलथिन । एही क्रममे श्री मुक्तिकान्त बाबू हुनका ओ ताम्रपत्र सेहो देखबाक हेतु देलथिन । ताम्रपत्र कारी भऽ गेल छलैक आ ओहिपर उत्कीर्ण पाठ अपठनीय भऽ गेल छल । उक्त क्यूरेटर महाशय ओ ताम्रपत्र हिनकासँ पढ़बाक हेतु लेने छलथिन मुदा, तकर पश्चात ओ ताम्रपत्र कतय गेल, कतय राखल अछि, आइधरि एहि विषयमे कोनो जनतब नहि उपलब्ध भऽ सकल अछि ।-लेखक



