Saturday, 11 October 2014

अभिनव विद्यापतिः मधुप


कविचूड़ामणि 'मधुप'
कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क पैतृक मधुबनी जिलाक कोइलख गाम छलनि । हिनकर जन्म हिनक मातृक दरभंगा जिलाक कोर्थू गाममे आश्विन शूक्ल पूर्णिमा (कोजगरा), मंगल दिन, १३१४साल तदनुसार २ अक्टुबर १९०६ई.केँ भेल छलनि । हिनक पिता कीर्तिनाथ मिश्र, उच्चकूलीन ब्राह्मण छलाह जिनका छह गोट विवाह छलनि । 'मधुप'क जन्म कीर्तिनाथ मिश्रक छठम पत्नी ‘भामादाई’क कोखिसँ भेल रहनि । मधुपक बाल्यावस्था हिनकर मातृकमे नाना लाल ठाकुरक देख-रेखमे बितलनि ।  ओतहिन हिनक पढ़ाई-लिखाई सेहो आरंभ भेल जतय ई दू बर्षधरि हिन्दी, गणित ओ मिथिलाक्षर सिखलनि । बादमे नवादाक जयभद्र झासँ हिन्दी ओ अंग्रेजीक शिक्षा भेटलनि । पं. नेवालाल झासँ लघुकौमुदीक अध्ययन केलनि ।
बारह बरखक उमेरमे पहिल बेर ई अपन पैतृक गेलाह । ओतय अध्यापक जयसिंह ठाकुरक देख-रेखमे ई भद्रकाली पाठशालामे १९२३ई.मे व्याकरणक प्रथमा परीक्षा द्वितीय श्रेणीसँ उतीर्ण भेलाह । एही पाठशालामे हिनका सुरेन्द्र झा नामक छात्रसँ भेँट भेलनि जे बादमे आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' नामसँ मैथिली साहित्य जगतमे ख्यात भेलाह । बादमे मध्यमाक अध्ययन हेतु ई लोहना स्थित संस्कृत विद्यापीठमे नामांकन करौलनि । मुदा, विभिन्न पारिवारिक समस्या ओ अर्थाभावक कारणेँ एतय हिनकर पढ़ाई बाधित भऽ गेल । १९२५ई.मे मध्यमा परीक्षामे असफलताक बाद ई वैद्यनाथधामक बालानन्द ब्रह्मचारीक आश्रममे पहुँचलाह जतयसँ १९२६ई.मे मध्यमाक परिक्षामे उतीर्ण भेलाह । १९२८ई.मे आगाँक अध्ययन हेतु ई काशी गेलाह  मुदा, स्वास्थ्य ठीक नहि रहने १९२९ई.मे ओतयसँ घूमि ऐलाह । एही अल्पावधिक काशी प्रवासमे हिनका कविवर सीताराम झा, ज्योतिषी बलदेब मिश्र, यात्री, किरण,आदि अग्रज ओ सहपाठीसँ सतसंग भेलनि जे बादमे हिनकर काव्य प्रतिभाक विकासमे सहायल भेलनि । काशीसँ घुमलाक बाद ई पुनः आगाँक पढ़ाई करबा लेल लोहना विद्यापीठ गेलाह । मुदा, किछुए दिनक पश्चात हिनका पितृशोक भेलनि आ एकबेर फेर हिनकर पढ़ाई बाधित भेल । पिताक स्वर्गारोहणक बाद मधुप जी अपन मातृकेमे बसि गेलाह आ पुनः बैद्यनाथ धामक विद्यापीठसँ १९३३ई.मे साहित्यशास्त्री ओ १९३४ई.मे व्याकरणशास्त्रीक परीक्षामे सफलता प्राप्त केलाह । आचार्यक अध्ययन हेतु ई मुजफ्फरपुरक धर्मसमाज संस्कृति कॉलेजमे नामांकन करौलनि । ओतहि हिनका 'भुवन', आरसी प्रसाद सिंह आदि साहित्यकारसँ परिचय बढ़लनि । ओतय कविशेखर बदरीनाथ झा हिनक अध्यापक छलखिन । एतहिसँ मधुप'क काव्यधाराक प्रवाह
जेना निर्वाध भऽ गेल । १९३६ई.मे साहित्य ओ १९३७ई.मे व्याकरणसँ आचार्य केलनि । १९३९ई.मे वेदान्त शास्त्रीमे सफलताक बाद ई सिमरा (मुजफ्फरपुर)क संस्कृत विद्यालयमे प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्त भऽ गेलाह। १९३९ई.मे वेदान्त शास्त्रीक दोसर खण्डमे सफलताक संगहि हिनकर अध्ययन समाप्त भेल । एहि बीच १९२७ ई.मे हिरणीक नन्दकिशोर चौधरीक भगिनी चन्द्रमुखी देवीसँ हिनक विवाह भेलनि । हिनकर मूल सासुर उमरी-बलिया छलनि एवं भागवत झा हिनक ससुर छलथिन । मधुप जीकेँ आठ गोट संतान , पाँच कन्या ओ तीन बालक भेलनि ।१९४०ई.मे ई अपन गामक समीप जयानन्द उच्च विद्यालय बहेड़ामे संस्कृतक अध्यापकक रूपमे नियुक्त भेलाह । एतय सैंतिस बरखक सेवाक बाद ५ अप्रैल १९७७केँ सेवा निवृत भेलाह । बहेड़ा हाई-स्कुलक वातावरणमे हिनक काव्य-प्रतिभाक अद्भुत विकास भेलनि ।
कांचीनाथ झा 'किरण' द्वारा चलाओल जा रहल हस्तलिखित पत्रिका 'मैथिली सुधाकर'मे हिनकर सर्वप्रथम 'मधुप'क उपनामसँ रचना प्रकाशित भेल छल । एहिसँ पूर्व 'सुमन' जीक संग पत्राचारक क्रममे ई 'मधुप' उपनामक सर्वप्रथम प्रयोग कएने छलाह । मैथिली भाषाकेँ हिन्दीक संक्रमणसँ बचेबाक लेल एवं एकर लोकप्रियता बढ़ेबाक हेतु मधुप जी साहित्य-समाजक उपहासक बादो 'अलि' छद्मनामसँ फिल्मी भासपर गीत लिखलनि जे अत्यंत लोकप्रिय भेल आ 'पचमेर' संग्रहमे प्रकाशित भेल । मुदा, हिनकर ई छद्मनाम बेसी छपित नहि रहि सकल । बादमे ई 'मधुप' उपनामसँ परंपरागत ओ नवीन शैलीमे अगणित गीत, कविता, अनेक कथाकाव्य, खण्डकाव्य ओ प्रबंधकाव्य’क रचना कएलनि । हिनकर करीब तीस गोट प्रकाशित-अप्रकाशित पोथी छनि जाहिमे, राधाविरह, मुक्त-मधुप (महाकाव्य), द्वादशी (कथा-काव्य), अपूर्व रसगुल्ला, टटका जिलेबी, पचमेर, गीत-मंजरी, चौंकि-चुप्पे, विदागीत, (गीत-संग्रह), शतदल, झांकार, गंगा तरंगावली, मधुप शप्तशती, परिचय शतक (मुक्तक काव्य), प्रेरणा-पुञ्ज (संस्मरण), ओ दुर्गा सप्तशती मैथिली सुधा (अनुवाद) किछु प्रमुख पोथी थिकनि । राधा-विरह पर हिनका १९७०ई.मे साहित्य अकादमी सम्मान भेटलनि । एकर अलावे हिनका कतिपय पुरस्कार भेटलनि । प्रायः १९४८-४९ई.क मैथिली महासभाक सहरसा अधिवेशनमे हिनका द्वारा राधाविरहक पाठसँ आह्लादित भऽ तत्कालीन राजपण्डित स्व. बलदेव मिश्र हिनका कविचूड़ामणि'क उपाधिसँ विभूषि कएने छलाह ।
मैथिली काव्य-साहित्यक इतिहासमे कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र 'मधुप'क काव्यक लोकप्रियता कविपति विद्यापतिक बाद प्रायः सर्वाधिक अछि । मधुप जी विशुद्ध रूपेँ कवि छलाह । हिनका पद्य लिखब सर्वाधिक रूचैत छल । गद्यलेखन हिनका कहियो नहि सोहेलनि । मधुपजीक विशिष्टता छल जे ई पत्राचारो कवितेक माध्यमसँ करैत छलाह । हिनकर कविता सभमेँ एकहि संग संस्कृतनिष्ठ ओ ठेठ शब्दाबलीक विलक्षण प्रयोग भेटैत अछि । हिनकर रचित काव्य-संसार भाषा ओ विषय-विविधताक विशाल भंडार अछि । 'मधुप'क सम्मोहक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक प्रभाव हिनकर परवर्ती साहित्यकार लोकनिपर सेहो पड़ल अछि । मणिपद्म, बहेड़, अणु, किसुन, अमर आदि स्वयं स्वीकार कएने छथि जे ओ लोकनि हिनके प्रेरणासँ मैथिली रचना दिस प्रवृत भेलाह ।
ई हिनक मातृभूमि ओ मातृभाषाक अनुरागेक परिणाम छल जे संस्कृत ओ हिन्दीक क्षमतावाद साहित्यविद रहितहुँ ई मिथिला-मैथिलीक सर्वांगिण विकास हेतु सदैव अपन लेखनीक संग तत्पर रहलाह । अपन कवि-व्यक्तित्वक बिनु परबाहे मैथिलीक घर-घर प्रचार हेतु फिल्मी तर्जपर गीत लिखैत रहलाह । मधुप जीक व्यक्तित्वमे एकहि संग परंपरा ओ प्रगतिवादक छाप भेटैत छल । संस्कृति-संस्कारक रक्षाक पक्षधर मधुप नहिए परंपराक अंधभक्त छलाह आ नहिए आधुनिकताक । समयक अनुरूप आचार-विचारकेँ बदलब हिनक प्रवृति छल । तहिना हिनकर साहित्यहुँमे एकदिस जतय पारंपरिक छन्द-शास्त्रक बेजोड़ प्रयोग भेटैत अछि ओतहि दोसरदिस मुक्तक, गद्यकाव्य, गजल, आदि नव-नव काव्य विधानक अनुशरण सेहो भेटैत अछि ।
मधुप जी वस्तुतः एकटा एहन आशुकवि छलाह जिनका कविता लिखबाक हेतु समय, स्थान,कि वातावरण आदिक जरूरति नहि पड़ैत छलनि । ओ स्वयं अपना हिसाबेँ तकर निर्माण करैत छलथि । मधुपक साहित्य साधना आम जनता लेल समर्पित छल । समकालीन कविक मध्य 'मधुप' एकमात्र कवि भेलाह जिनकर रचना आम ओ खास दुनू वर्गमे समान रूपेँ सम्मानित भेल । हिनकर काव्यक लोकप्रियता देखि हिनका 'अभिनव विद्यापति' कहल जाए लगलनि । करुणरसक एहि रससिद्ध कवि व्यक्तित्व ओ कृतित्व दुनूमे विविध रस-भण्डार भेटैत अछि । मिथिला ओ मैथिलीक एहि कवि, गीतकार, अनुवाद, महाकवि, गजलकार, भक्त, चिन्तक, सुधारक ओ मैथिली आंदोलनक एकटा कर्मठ सिपाही कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र 'मधुप'क जीवन यात्रा पूर्णिमासँ आरंभ भए अमावस्या धरि पहुँचलनि जखन ओ पूसमास, रवि,१३९५ साल, तदनुसार २० दिसंबर १९८७ई.क कारी रातिमे अपन नश्वर शरीरकेँ त्याग कएलनि । -चंदनकुमार झा

साभारः-www.mithimedia.blogspot.in