शिखा,सूत्र,त्रिपुण्ड आ ढ़ेका'क सामंतवादी ओ संकीर्ण परंपरावादी मान्यता, तथाकथित “संस्कार” केर विरोधमे 'यात्री' आ प्रो. हरिमोहन झा मैथिली साहित्यमे जाहि प्रगतिशील विचारधारा केर सूत्रपात केलनि तकरे चरम परिणति राजकमल'क साहित्यमे भेल । राजकमल कथाकार ललित'क प्रेरणासँ मैथिली लेखनमे अएलाह । मात्र अड़तीस बरखक अल्पायुमे स्वरगंधा, आदिकथा, आन्दोलन, ललका पाग, एकटा चंपाकली आ एकटा विषधर, आदि अनेक कालजयी रचना एहि प्रखर ओ प्रवीण साहित्यकारकेँ मैथिली साहित्यक इतिहासमे अमर बना देलक । महीषी'क फूल बाबू उर्फ मणीन्द्रनारायण चौधरी उर्फ राजकमल चौधरी हिन्दी-मैथिली'क नव पीढ़ीक साहित्यकारक लेल आदर्श बनि गेलाह तथा समस्त समकालीन साहित्य समाजकेँ अपन व्यक्तित्व ओ कृतित्वसँ प्रभावित केलनि । हिनकर 'मछली मरी हुई', 'नदी बहती थी', 'अग्निस्नान', 'देहगाथा' 'ताश के पत्तों का शहर', 'मुक्ति प्रसंग' 'इस अकाल वेला में','मछलीजाल' आदि विपुल हिन्दी साहित्य भारतीय समकालीन साहित्यक धरोहर थिक तथा हिन्दीक विशाल साहित्य-संसारमे बेस सम्मानित अछि । स्वछंद ओ अलबेला प्रकृतिक राजकमल कहियो कोनो बन्हनकेँ स्वीकार नहि केलनि आ नहिए कोनो खास विचारधारासँ अपनाकेँ जोड़ब पसिन केलनि । ओ सदति अपन निर्धारित बाटपर चलैत रहलाह । अपन लक्ष्य सधैत रहलाह । निरंतर, निर्विकार, समस्त छल-छद्मसँ दूर, ।
राजकमल चौधरी'क व्यक्तित्व ओ कृतित्वमे फर्क नहि छलनि । ओ यथार्थवादी छलाह । देश-दुनियामे जएह देखलनि, अपन छोट-छीन मुदा जीवनक विविध रंगमे बोरल जीवनकालमे जएह भोगलनि तकरे अपन साहित्यमे जगह देलनि । अपन रचनाक मार्फत परिवार, धर्म, राजनीति, और समाज’क मूल्यहीनताकेँ उघारब, एकर जड़ताकेँ उधेसब राजकमलक स्वभाव बनि गेल । मुदा,
हिनकर स्पष्टवादी मिजाज जिनका सभकेँ नहि पचलनि से सभ हिनका लेल अपशब्दक विशेषण आजीवन गढ़ैत रहलाह । मैथिली-हिन्दी साहित्यक एहि विलक्षण प्रतिभाक जीवन ओ कृति दुनू अत्यंत विवादित रहल आ एहि विवादक जड़ि छल हिनकर ईमानदारी । ई अपन जीवनक कोनो नीक कि बेजाय पक्षकेँ रहस्य नहि रखलनि बल्कि जहिना लोकक पोल खोलैत रहलाह तहिना अपनो जीवनक महलमे कहियो खिड़की, केबाड़ कि परदा नहि लगौलनि । सुख-दुख'क झंझावातमे हिनकर जीवन'क पन्ना-पन्ना एखनो उधियाइत बुझना जाइत अछि । मुदा, जहिना सामाजिक दर्शनक चरमोत्कर्ष साम्यवादकेँ शतप्रतिशत अंगिकार करब आ तदनुरुप ओकर क्रियान्वयन लेल प्रयास करबाक सामर्थ्य अधिकांश समाजवादीमे नहि रहैत अछि आ घुमि-फिरि सामंतवाद कि परिवारवाद'क लगीच आबि ठमकि जाइत अछि एवं अपन असफलताकेँ नुकेबा हित साम्यवादकेँ ''अंगूर खट्टे है'' केर भासपर नवपरिभाषामे गढ़ैत छथि तहिना राजकमल चौधरी केर साहित्यक मुल्यांकनक लेल सेहो परंपरावादी समालोचक लोकनि अपन-अपन सामर्थ्यहीनताकेँ नुकेबा हेतु नित नवीन परिभाषा गढ़लनि आ राजकमलक साहित्य उपेक्षा-अपमानक शिकार होइत रहल ।हिनकर साहित्यक सकारात्मक पक्षकेँ गौण राखल गेल । तखन ई एहि विराट व्यक्तित्वक महानता छल जे ओ एहि सभ कुचेष्टा, उलहनसँ बेपरवाह, सदति लड़ैत रहलाह आ समाजक घूनकेँ छोड़बैत रहलाह । मुदा, ई दुर्भाग्यजे हुनकर जीवन घूने छोड़बैत बीति गेल आ नव समाज आ सामाजिक परंपरा गढ़बाक हुनकर लिलसा पूर नहि भऽ सकल ...हुनकर कविता काँचे रहि गेल ।
राजकमल चौधरी'क साहित्य’क चर्चा जखन होइत अछि तऽ सभसँ पहिने एकरा अश्लील ओ विद्रूप कहि अपठनीय घोषित कएल जेबाक कुकृत्य होइत रहल अछि । मुदा, हिनकर साहित्यमे वर्णित ‘सेक्स’, ‘पोर्न’ नहि थिक बल्कि तथाकथित भद्रजन-समाज'क एकटा स्याह पक्ष थिक । प्रेमक प्रतीक थिक । पेट भरबाक साधन थिक । प्रेमीक संग छल थिक । ई एकदिस तिरिया चरित्रकेँ उजागर करैत अछि तऽ दोसरदिस पुरुषक, स्त्रीक प्रति घृणित मानसिकताक सेहो । एहिठाम सेक्स नारी चिंतनक एकटा गूढ़ आधार थिक । मात्र अभिधाक आधारपर राजकमलक काव्यक अर्थ अकानब संभव नहि ओकर लक्षणा ओ व्यंजना शक्तिकेँ अनुभूति हिनकर काव्यक असल मर्म उजागर करैत अछि तहिना हिनकर कथा-साहित्य मात्र कथ्य, कथानक, संवाद कि शिल्प बुझने नहि बल्कि ओकर पात्रक चरित्रक विश्लेषणसँ बुझबामे अबैछ ।
राजकमल चौधरी मैथिली साहित्यकेँ विश्वसाहित्यक समकक्ष लय जेबाक पक्षधर छलाह । आ से सतत एहिमादेँ अपन रचनाधर्मिता'क बलपर प्रयत्नशील बुझना जाइत छथि । मुदा, ताहिसँ पूर्व ओ मैथिली साहित्य-पटलपर जनमल कजरी आ बीझकेँ उपटाबय चाहैत छलाह । ई एहन कजरी(कदइ) छल जकरा हमरा सभकेँ उबटन कहि बुझायल गेल छल । मुदा, जखन यात्री-हरिमोहन'क शह पाबि राजकमल एकरा छोरयबाक प्रण लेलनि आ अपन धरगर कलमसँ एकर दागकेँ खुरचय लगलाह तऽ बहुतो गोटे केँ लगलनि जेना हुनकर चाम सिसोहल जा रहल अछि । उपरसँ राजकमल-साहित्यक लोकप्रियता हिनकर सभक एहि घाव पर नोनक काज केलक आ ई सभ किकिया उठलाह । मुदा, आब दलित-पछरल आम-जनताकेँ सेहो नवका मटकुरक दहीपरहुक छाल्हिकेँ स्वाद लागि गेल छलैक । आ से शिखा-सूत्र-त्रिपुण्ड'क गोलैसीसँ बाहर निकलबाक लेल आफन तोड़ि रहल छल । ओ सब अपनहिसँ भगवानक भोग लगबय लागल छल । एहि लेल आब ओकरा सभकेँ कोनो धोधिबला पण्डित'क खगता नहि रहैक । पुरोहित-पण्डित लोकनि सभक पण्डितारे ध्वस्त भऽ रहल छलनि । परंपराकेँ प्रगतिवाद पछुआ देने छल । साँची आ ढ़ेका प्रतिष्ठा'क प्रतिबिंब नहि रहल बल्कि शोषण'क प्रतीक बूझल जाए लागल छल । राजकमल चौधरी एहि सामाजिक परिवर्तन केर मर्मकेँ अकालनि आ तेँ हुनकर साहित्य लोकप्रियताक शीर्ष छूबि रहल छल । समकालीन साहित्यकारकेँ एहि बातक ध्यान रखबाक चाही । साहित्य मात्र सिद्धांते धरि नहि ओझरायल रहि जाए बल्कि ओहिमे सामाजिक-व्यवहारिक पक्ष सेहो हो । तखने साहित्यकार आ आमजनता'क मध्य संवाद स्थापित भऽ सकत । साहित्यकारक गप लक्षित पाठक धरि पहुँचि सकत ।
वर्तमान समयमे कहल जाइछ जे आब वएह भाषा-साहित्य जिवित रहत आ समृद्धि पाओत जकरामे विश्वक आन-आन साहित्यसँ लड़बाक क्षमता हेतैक । एहि वैश्वीकरणक समयमे अखिलविश्वकेँ प्रभावित करबाक क्षमता हेतैक । एहि बातक आभास राजकमलकेँ पूर्वहिमे भेल छलनि आ तेँ ओ नवतुरिया लेल वैश्विक पटल तैयार करबामे लागि गेल छलाह । मुदा, हुनकर असामयिक अवसान एहि यज्ञमे विघ्न केलक । तखन एहनामे नवतुरिया साहित्यकारक ई विशेष दायित्व बनैत अछि जे ओ यात्री-हरिमोहन-राजकमल'क देखाओल पथपर चलैत हुनकर सभक टुटल स्वप्नकेँ लक्ष्यधरि पहुँचेबाक प्रयास करथि । मैथिली साहित्य एकबेर फेर आम मैथिलक मध्य लोकप्रिय हो । मैथिली साहित्य विश्वस्तरपर समादृत हो । आइ खगता अछि जे आदर्श ओ यथार्थक संतुलित संमिश्रण'क आधार पर प्रगतिवादी सोचक उपस्थापन साहित्यकार वर्ग अपन साहित्यमे करथि ।
राजकमलक अवसानसँ ओनातऽ संपूर्ण साहित्य जगत मर्माहत छल मुदा मैथिली साहित्यक जे दू गोटे ठोहि पारि कनैत छलाह से छलाह यात्री ओ हरिमोहन झा । हिनकर सभक आँखिक नोर आ हृदयक वेदना राजकमलकेँ श्रद्धाजलि स्वरूप लिखल हिनकर सभक कवितामे स्पष्टतः अनुभव कएल जा सकैत अछि । हरिमोहन बाबूक नोर जखन कागतपर पड़ल तखन -
“सुकुमार काव्यकेर ताजमहल
प्रतिभाक पुंज हे राजकमल
वाणीक दिवंगत पुत्र सबल
अगणित मानसमे रहब बनल
हे अमर , हमर शुचि राजकमल
" …..कहैत आखर रूपमे प्रकट भेल । एहिना यात्री (नागार्जुन)क नोर सेहो कागतपर ओलरि गेलआ मात्र किछुए शब्दमे जेना राजकमलक संपूर्ण व्यक्तित्व ओ कृतित्वक मर्मकेँ उद्घाटित कऽ देलक -
“बिम्बग्राही तुम स्वच्छ स्फटिक तुम प्रभा तरल
भासित जिसमें सित-असित, मलिन एवं उज्जवल
तुम चर्चाओं के केन्द्रविन्दु, तुम नित्य नवल
इस-उस पीढ़ी के लिए विरोधाभास प्रबल
बाहर छलनामय, भीतर भीतर थे निश्छल
तुम तो थे अद्भुत व्यक्ति चौधरी राजकमल
" कहल जाइत अछि जे यात्री अपन जीवनमे जतबे दुखी अपन अर्धांगिनी'क स्वर्गारोहण'क बाद भेल रहथि ततबे दुखी राजकमलक महाप्रयाणक बाद सेहो । संभवतः एहि नोरक कारण किछु आर नहि बल्कि ओ सब राजकमलक कलममे मैथिली साहित्यक उज्वल भविष्यक मादेँ जे आश्वासन देखने रहथि तकर असामयिक छिड़िआयब छल । १३ दिसंबर १९२९केँ रामपुर हवेली, जिला सहरसा (बिहार) में, अपन मातृकमे जन्म लेनिहार पं. मधुसूदन चौधरी'क पुत्ररत्न राजकमलक असामयिक निधन १९ जून १९६७केँ पटनामे मात्र ३८ बरखक अवस्थामे भऽ गेल । एहि महान कलमसेवीकेँ हमर शत-शत नमन ।--चंदनकुमार झा
